Tuesday, 15 May 2012

आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन का प्रोजेक्ट "हमारे गाँव"


गाँवों में कभी भारतवर्ष की आत्मा निवास करती थी. हमारे गाँव ही सदियों हमारी पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी सभ्यता-संस्कृति, विचार और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने हमारे गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे गाँवों को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत बड़ी कीमत वसूली. गाँवों से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़ गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़ गया.
आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने हमारे गाँव की वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ हमारे गाँवनाम से एक अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.
‘हमारे गाँव’ नामक इस अद्भुत प्रोजेक्ट का सृजन लेखक-पत्रकार, समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने किया है. आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू हो चुका है.

Thursday, 10 May 2012


शब्दों को ज़मीन पर उतारने की
पहल शुरू की धनंजय कुमार ने

आँगन सोशिओ-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने अपने प्रोजेक्ट ‘हमारे गाँव’ को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बनाए गए इस प्रोजेक्ट की शुरूआत बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव से की गई है. दरअसल बिन्द सिर्फ एक गाँव नहीं, ब्लॉक है, जो आसपास के बीस से अधिक गाँवों की शैक्षणिक,प्रशासनिक और मार्केट की ज़रूरतों को पूरा करता है, इन गाँवों के निवासियों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करता है.
आँगन सोशिओ कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन के इस प्रोजेक्ट के सर्जक धनंजय कुमार हैं. वह पत्रकार-लेखक, विचारक व चिंतक होने के साथ-साथ फिल्म निर्देशक भी हैं. उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट को तीन चरणों में बाँटा है. फिर हर चरण को भी तीन-तीन भागों में बाँटा है, ताकि प्रोजेक्ट तय समय में धरातल पर उतर जाए.
पहले चरण के पहले भाग में गाँव में वास्तविक शिक्षा का वातावरण बनाने पर कार्य शुरू किया गया. ‘शिक्षा क्यों और कैसे?’ इस विषय पर अभिभावकों,शिक्षकों और विद्यार्थियों में दृष्टि-निर्माण को लेकर संवाद स्थापित किया गया और उन सबकी सहभागिता से विचार को व्यवहार में साकार होता देखा गया.
इस क्रम में धनंजय कुमार ने सबसे पहले शिक्षकों पर प्रयोग किए. उन्होंने जब शिक्षकों से पूछा कि बच्चों को आप क्या देना चाहते हैं ? तो आगंतुक शिक्षकों ने कहा-ज्ञान! उनको अच्छी तरह से पढ़ाएँगे, ताकि हर परीक्षा में अव्वल आएँ और आगे जाकर कुछ बन सकें. इसपर धनंजय कुमार ने शिक्षकों से पूछा कि वह बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं? शिक्षकों का जवाब था, ’वह क्या बनेंगे-डॉक्टर,इंजीनियर या कुछ और, यह तो विद्यार्थियों के परिश्रम और अभिभावकों की चाहत पर निर्भर करता है. इस पर धनंजय ने पुन: सवाल किया कि क्या बच्चे वो सब पढ़ना चाहते हैं, जो आप पढ़ाना चाहते हैं ? शिक्षक ने आसान सा उत्तर दिया बच्चे स्कूल आएंगे तो वे वो तो पढ़ेंगे ही, जो हम पढ़ाएँगे, तभी तो परीक्षा में बढ़िया परिणाम आएँगे. इस पर धनंजय ने कहा कि बच्चे अब उस तरह से नहीं पढ़ना चाहते हैं, जैसे सालों से उनको पढ़ाया जा रहा है. आज के बच्चों को उपदेश और ज्ञान नहीं चाहिए. आपसे वह दो चीज़ें चाहते हैं-एक, उनको आप अपना कीमती समय दीजिए और दूसरा अपने कान दीजिए. उनको सुनिए,वो क्या कहना चाहते हैं? और ऎसा क्यों कहना चाहते हैं ?वो आपसे क्या चाहते हैं? क्या और कैसे पढ़ना चाहते हैं? फिर उसपर चिंतन कीजिए, विश्लेषण कीजिए और कहीं व्यवधान हो, रुकावट हो, तो बच्चों को आगे का रास्ता दिखाइए/सुझाइए, उसे गाइड कीजिए. उन्हें कतई पढ़ाने की कोशिश मत कीजिए. ज़माना बदल चुका है. विचारों और जानकारियों में नित नए परिवर्तन आ रहे हैं. बच्चे आपके साथ के बगैर वो बातें जान-सीख सकते हैं. बच्चे उपदेश सुनने के बजाए खुद अनुभव कर अभ्यास करना चाहते हैं. अगर आपको लगे कि वो मार्ग से विलग हो रहे हैं या गलत रास्ते जा रहे हैं तो उपदेश देने के बजाए उनके साथ संवाद कीजिए. एक मित्र की तरह.
धनंजय कुमार ने फिर उन आगंतुक शिक्षकों के सामने सवाल रखा कि आप बच्चों से क्या लेना चाहते हैं? वे चौंके! शायद उनके सामने पहली बार यह सवाल आया था. वह कुछ जवाब नहीं दे पाए. तब धनंजय ने कहा कि न्यूटन के गति का तीसरा नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है, इसका मतलब है कि बच्चे अगर आपसे कुछ लेंगे तो अवश्य आपको कुछ देंगे..हम जैसे-जैसे उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं जीवन में गाँठें बढ़ती जाती हैं, लेकिन बच्चे गाँठ पड़ने ही नहीं देते. आपस में लड़ते-झगड़ते हैं और फिर थोड़ी ही देर में वे दोस्त भी बन जाते हैं. मतलब बच्चों से आप जीवन की गाँठें खोलना सीख सकते हैं. तो आप उनको गणित और विज्ञान के सूत्र सिखाइए, वो आपको जीवन का सूत्र सिखाएँगे.
इसके बाद धनंजय कुमार ने विद्यार्थियों के साथ संवाद शुरू किया. टीचर भी पास में ही खड़े थे. सभी विद्यार्थी सहमे हुए से थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से इसका कारण जानना चाहा, तो किसी भी विद्यार्थी ने स्पष्ट उत्तर नहीं दिया. किसी तरह के डर की बात तो नहीं की, मगर चेहरे पर डर के भाव साफ दिख रहे थे. धनंजय कुमार ने सबसे पहले विद्यार्थियों से कहा कि वह टीचर नहीं दोस्त हैं, इसलिए कोई भी बात करने में झिझकना नहीं. फिर सबको अपना परिचय दिया और विद्यार्थियों के साथ धनंजय कुमार का संवाद आगे बढ़ने लगा. सुखद आश्चर्य यह था कि थोड़ी देर में ही विद्यार्थी सहज हो गए थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से पूछा कि सबसे ज्यादा मन किस काम में लगता है- सभी विद्यार्थियों ने एक मत से कहा कि खेलने में सबसे अधिक मन लगता है. यह धनंजय के संवाद कौशल्य का ही प्रभाव था कि सभी विद्यार्थी जो कुछ देर पहले सहमे हुए थे अब सहज और मुखर सहभागी बन गए थे. अब विद्यार्थियों के बीच हँसी और ठिठोली भी शामिल हो चुकी थी. एक घंटे के इस संवाद शिविर में धनंजय कुमार के साथ विद्यार्थियों ने क्रिकेट से लेकर सूरज और महात्मा ग़ाँधी तक बात की. शिविर के समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों ने माना कि बात-बात में धनंजय सर  ने जिस तरह से पढ़ाई से हमें जोड़ दिया, उस तरह का हमारा पहला और अनोखा अनुभव है. पढ़ना बोझिल काम लगता है, मगर धनंजय सर ने पढ़ाई को खेल के जैसा मनोरंजक बना दिया. टीचर भी विद्यार्थियों में अभी-अभी आए बदलाव और उत्साह को देखकर सुखद आश्चर्य में थे.   

Tuesday, 1 November 2011

आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!


मित्रों! आज रात की ट्रेन से मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...वो गाँव जिसकी गोद में मैंने जन्म लिया,जिसकी गलियों में मैंने चलना सीखा, जिसकी हवाओं में मैंने उड़ना सीखा, जिसके स्कूल में जीवन का ककहरा सीखा,जिसकी रातों में मैंने सपने देखना सीखा,जिसकी खुश्बू ने सौन्दर्यबोध से परिचय कराया.
मित्रों, उस गाँव को आज से 27 साल पहले छोड़कर मैं शहर आया था, दुनिया की ऊँचाइयों और जीवन की गहराइयों को पढ़ने-समझने और देखने. इन 27 वर्षों में पाने की ललक में इस कदर उलझा रहा कि गाँव मेरी राह देख रहा है, इसका कभी ध्यान ही नहीं आया. गाँव से दूर पटना और फिर मुम्बई आकर मैंने क्या-क्या पाया, इसका आकलन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन क्या-क्या खोया इसका आकलन सिर्फ मैं ही कर सकता हूँ.
हिसाब लगाता हूँ,तो पाता हूँ, मैंने पाया कम खोया ज्यादा. मासूमियत खोई,जवानी खोई,सौन्दयबोध खोया, सपने देखने की आदत खोई,चलना खोया,उड़ना खोया, संस्कार खोया, परिवार खोया,इंसानियत खोई. प्रकृति खोई,आज़ादी खोई,घर खोया.....खोया...खोया...खोया...ओह सब कुछ खो दिया...! फिर से सब पाना चाहता हूँ, इसीलिए गाँव जा रहा हूँ...
लेकिन गाँव में रह रहे लोग मुझे आगाह कर रहे हैं...जिस गाँव को आप छोड़कर आप आए थे, वो गाँव भी बिल्कुल वैसा नहीं रहा. इन वर्षों में गाँव ने भी बहुत कुछ खो दिया है...बैल खो दिए, खेतों में रोपनी करती मजदूर महिलाओं के गीत खो दिए...खलिहान खो दिए...आंगन खो दिए...संयुक्त परिवार से भरा-पूरा घर खो दिया....बच्चे खो दिए... युवा खो दिए...बूढ़ों की बच्चों के साथ की खिलखिलाहट खो दी... गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों का रेला खो दिया....होली- चैता- बारहमासा खो दिया....नीम–बबूल के दातुन खो दिए...झाल-मजीरे-ढोलक की थाप खो दिए....कबीरपंथी आलाप खो दिए...खो दिए..खो दिए..
ओह ....!!! तो पाया किसने?
गाँव का टपोरी मुखिया बन गया है...लम्बी गाडी खरीद ली है..
एक साथ तीन लोगों की हत्या कर गाँव को दहशत से भर देनेवाला बदमाश जिला परिषद का अध्यक्ष बन गया है....वह लाल बत्ती की सरकारी गाड़ी से सुरक्षा-घेरे के बीच आता-जाता है.
स्कूल में बार-बार फेल होनेवाला इलाके का सबसे बड़ा ठीकेदार बन गया है...
फ्रॉड के केस में जेल जा चुका युवक सरपंच बन गया है....चोरी-चुपके देशी शराब बनानेवाला गाँव का सबसे बड़ा व्यापारी बन गया है...
कोई बात नहीं...मैं फिर भी गाँव आना चाहता हूँ...अपनी यादों को फिर से गाँव की हवाओं में बसाना चाहता हूँ.
मैं वहाँ अपनी पुश्तैनी खेती फिर से शुरू करना चाहता हूँ...अच्छा स्कूल और पुस्तकालय खोलना चाहता हूँ....पढ़ने-लिखने का माहौल बनाना चाहता हूँ....संस्कार-संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहता हूँ....चैता-फाग-बारहमासा की धुनें फिर से गुंजाना चाहता हूँ...खेतों में रोपनी-गीत गवाना चाहता हूँ...
तो आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!
 धनंजय कुमार

Monday, 24 October 2011

यह कैसा विकास है भाई???


देश विकास कर रहा है,यह ढोल बजा-बजाकर, तरह-तरह के आँकड़े दिखा बताए जा रहे हैं. बेशक आर्थिक आँकड़े सच हों. मगर यह भी एक कठोर सच्चाई है कि देश में गरीबी और गरीबों की संख्या कहीं अधिक बढ़ी है. विकास के इस स्वरूप ने विषमताएँ बढ़ाई हैं. मुट्ठी भर चालाक किस्म के लोग ज़रूर अमीर हुए हैं, किंतु बाहों से भी अधिक लोग गरीब हुए हैं-दरिद्रता की हद तक गरीब. दुखद यह है कि इस बढ़ते भौतिकवाद ने मानवीय संवेदनाएँ भी हमसे छीनी है. हमारी धंनलोलुपता असीमित बढ़ी है. संयुक्त परिवार के बाद अब एकल परिवार भी टूटन की ओर हैं. ये कैसा विकास है, जहाँ हम अंत में अकेले हुए जा रहे हैं!
गाँवों की हालत यह है कि युवा प्रतिभा और मजदूर दोनों शहरों की ओर पलायन कर गए हैं.बचे किसानों को अनिश्चितता ने और बुरी तरह दबोचा है. एक तरफ बाढ़ और सूखे की स्थिति ने उन्हें असहाय बनाया है, वहीं आधुनिक विकास ने उनके सामने मजदूरों की समस्या खड़ी कर दी है.खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते, क्योंकि शहर जितनी नगद मजदूरी मजदूरों को देता है, बेचारे किसान नहीं दे सकते.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादा पैसे के लालच में मजदूर शहर में नारकीय जीवन जी रहे हैं.लगभग सारे शहरों की स्थिति बिगड़ी है.पलायन की वजह से बढ़ी भीड़ ने शहर की खूबसूरती और चमक-दमक दोनों को ध्वस्त किया है. सड़कों पर जाम की स्थिति हो या नागरिक सुविधाओं की बात हो, हर जगह भीड़ ने कचरा किया है. भ्रष्टाचार को बढ़ाने में भी पलायन की ज़बरदस्त भूमिका रही है.
दूसरी तरफ गाँव प्रतिभा और मजदूरों की समस्या से त्रस्त है.गरीबों का रहना अब ग़ाँव में भी दूभर हो गया है,क्योंकि महँगाई समान अनुपात से बढ़ी है,लेकिन गाँव में कमाई के अवसर न्यूनतम हुए हैं.मजदूरों की कमी के चलते किसान बैल और हलवाहा की जगह ट्रैक्टर आदि से खेती करने को मजबूर हैं,जो कि नगदी की माँग करता है. और किसानों के पास कितनी नगदी होती है, यह बताना शर्मिदा करने जैसा होगा.
आधुनिक विकास ने गाँव को एक और तरीके से भी गरीब बनाया है-ग्रामीण विकास की सरकारी योजनाओं ने पैसों की जो 'बरसात' की है, उसने युवाओं को काहिल और भ्रष्ट बनाया है.गाँव में छूट गए लोग सरकारी धन की लूट में ज़ोर-शोर से लगे हैं. 20 साल का आदमी वृद्धा पेंशन ले रहा है.थोड़ा सा भी चालू-पुर्जा आदमी ठेकेदार बन जाने की जुगत में लगा है.कृषि के नाम पर मिल रहे अनुदानों की बंदरबाँट हो रही है.पंचायत के वार्ड मेंबर से लेकर बीडीओ साहब तक सरकारी लूट का लाभ उठा रहे हैं. और जो कमजोर हैं, मरने को अभिशप्त हैं.शहरों में भी और गाँवों में भी.
यह कैसा विकास है भाई???

Sunday, 16 October 2011

बराबरी और शुद्धता का लोकपर्व है छठ

छठ ठेंठ बिहारी लोकपर्व है, किंतु पिछले कुछ दशकों से इसकी पहचान राष्ट्रीय लोकपर्व के रूप में उभरी है. चूँकि बिहारियों की इस लोकपर्व में अद्भुत श्रद्धा और आस्था है, इसलिए रोटी-रोजगार के चक्कर में प्रवासी बनकर बिहारी जहाँ भी गए, छठ को अपने साथ लेते गए. आज स्थिति यह है कि पटना के गँगा तट से कहीं अधिक मुम्बई के अरब सागर तट और दिल्ली के यमुना तट पर छठ व्रतियों का मेला लगता है.
छठ की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है. हाँ, पुराणों में इसकी चर्चा अवश्य है. इसमें सूर्य देवता की पूजा होती है और यह मुख्यतः पुत्र-प्राप्ति के लिए की जाती है. ज्योतिष की मानें, तो सूर्य आत्मा का कारक है और आत्मा की जन्म-मरण से मुक्ति के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है. मान्यता यह है कि पितरों की आत्मा तभी तृप्त होती हैं अथवा मोक्ष मिलता है, जब मृत्यु के पश्चात पुत्र मुखाग्नि देता है और श्राद्ध करता है.
यहाँ पर यह जानना भी दिल्चस्प है कि छठ में पूजा सूर्य देवता की होती है, मगर छठि मैयासंबोधित कर पूजा-अर्चना की जाती है.,सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है. इस सन्दर्भ में कथा कुछ इस तरह है कि एक स्त्री को विवाह के बाद कई सालों तक कोई पुत्र नहीं हुआ. ससुराल में सास-ननद ने बाँझ कहकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. दुखों से मुक्ति के लिए उस स्त्री ने आत्मा के कारक देवता सूर्य की पूजा की. सूर्य के आशीर्वाद से वह गर्भवती हो गई, मगर  सास-ननद की प्रताड़ना कम नहीं हुई. तब भगवान सूर्य ने स्वयं बूढ़ी स्त्री का वेश धरकर माँ की तरह उस स्त्री की सेवा की. प्रसव कराया. पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. बूढ़ी स्त्री का रूप धारण किए सूर्य भगवान ने अपना परिचय छठि मैयाके तौर पर दिया. तभी से सूर्य को छठि मैया के रूप में पूजा जाने लगा.
यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है- कार्तिक मास और चैत्र मास में. अधिकांश लोग कतिकी छठ करते हैं. मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से छठ का विधान शुरू हो जाता है. चतुर्थी के विधान को संजत या नहाय-खाय बोलते हैं. इस दिन व्रती स्नान कर लौकी और ओल की तरकारी, चने की दाल और अरवा चावल का भात पकाते-खाते हैं. पंचमी को लोहंडा या खड़णा होता है. इस दिन व्रती दिनभर के उपवास के बाद रात में पूजा का प्रसाद ग्रहण करते हैं. फिर वही प्रसाद घर के बाकी सदस्य और आमंत्रित मेहमान खाते हैं. षष्ठी को व्रती फिर उपवास रखते हैं. सूर्यास्त के समय घाट (समुद्र,नदी, तलाब आदि कोई भी स्वच्छ जलाशय का किनारा) पर जाकर सूर्य या कहें छठि मैया को सन्ध्या अर्घ्य देते हैं. अगले  दिन यानी सप्तमी को सुबह का अर्घ्य देकर व्रती अपना निर्जला उपवास तोड़ते हैं. इस तरह सप्तमी को छठ-व्रत सम्पन्न होता है.
छठ को आमतौर पर लोग छठ-पूजा से संबोधित करते हैं. किंतु यह सिर्फ पूजा नहीं है,व्रत है. इसीलिए छठ को वास्तव में छठव्रतकहा गया है और छठ करनेवाले को व्रती. पुजारी या पुजारिन नहीं. व्रत शुद्धता का, पवित्रता का, समानता का, मानवीयता का और साक्षात भक्ति का. इस लोकपर्व में मन,आत्मा और व्यवहार तीनों की शुद्धि- निष्कलुषता ही मूल है. इसीलिए जाति-पाति,ऊँच-नीच और आडम्बरयुक्त धार्मिक कर्मकाण्डों से परे यह पर्व मनाया जाता है. अमीर हों या गरीब सभी एक ही घाट पर जमा हो सूर्य की पूजा करते हैं. उन्हें अर्घ्य देते है. पूजा के सामान और प्रसाद कच्चे बाँस के बने जिस डाला और सूप में रखकर व्रती घर से घाट पर ले जाते हैं, उस डाला या सूप को समाज की सबसे निम्न मानी जानेवाली जाति डोमजाति के लोग बनाते हैं. पूजा-विधान बिना किसी ब्राह्मण के स्वयं व्रती द्वारा किए जाते हैं. निश्चित रूप से ब्राह्मणवाद का इसमें खुला विरोध दर्ज है. परमात्मा से आत्मा के संवाद-सम्पर्क के लिए विभिन्न धर्मों के ब्राह्मणों, पादरियों और मुल्ला-मौलवियों ने जो दीवार खड़ी की है, छठव्रत उसे खारिज करता है और आत्मा को सीधे परमात्मा से जोड़ता है.
आज जबकि पूरी दुनिया में स्त्री-पुरुष की समानता की बात की जा रही है, छठ में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है. सिर्फ स्त्री ही व्रत रखेगी, ऎसी कोई बाध्यता नहीं है, बल्कि पुरुष भी यह व्रत रखते हैं.
ऎसे में छठ पूरे मानव-जाति के लिए कितना प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है यह समझा जाने योग्य है और यह जो छठ बिहार के लोकपर्व के रूप में देश-दुनिया में मशहूर हो रहा है, उसे पूरी मानव-जाति के पर्व के रूप में मनाने की आवश्यक्ता है.
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धनंजय कुमार

Friday, 14 October 2011

चाँद से बेहतर माँ


कभी लिखता, कभी मिटाता हूँ, शब्दों से चित्र बनाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

है याद मुझे वो लोरी माँ, तू चाँद के गीत सुनाती थी,
तेरी गोद में सपने बुनते-बुनते नींद मुझे आ जाती थी,
वही चाँद, मगर वो नींद नहीं, क्यों ठगा-ठगा रह जाता हूँ.
ऎ माँ, तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

माँ ! ममता तेरी, क्षमता तेरी, दूध और भात, कटोरी तेरी,
माँ ! आँचल तेरा, लोरी तेरी, वो मीठी-मीठी थपकी तेरी,
झूठा श्रेय ले जाता था वो, आज समझ मैं पाता हूँ.
ऎ माँ !तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

चाँद है अपना, झूठा सपना, संकट के पल टूटा सपना,
ये तो सुख का साथी है बस, दूर गगन का वासी है बस,
दुःख के पल बस माँ तुझको ही, अपने पास मैं पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

परियों वाली सभी कहानी झूठी-झूठी लगती है,
एक कहानी तेरी बस माँ सच्ची- सच्ची लगती है,
भूल गया वो सारे किस्से, तुझको भूल न पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

तेरा हक़ छीना है सबने, सपनेहों याकि हक़ीकत हो,
समझ गया अब राज सभी, क्योंकि माँ तुम एक औरत हो.
तू तो सबकी जननी है फिर, विवश तुझे क्यों पाता हूँ ?
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

धनंजय कुमार

Monday, 10 October 2011

शिक्षा का बेड़ा गर्क किसने किया ?



बाहर के अन्धकार को मिटाने के लिए कई प्रकाशश्रोत हैं-दीया से लेकर सूर्य तक. किंतु अंतर के अन्धकार को सिर्फ शिक्षा ही मिटा पाती है. वह शिक्षा ही है, जिससे मनुष्य स्वयं से लेकर ब्रह्म को जानता है. वह शिक्षा ही है, जो मनुष्य को जानवर से अलग करती है.
वैदिक काल में शिक्षा का यही रूप था. जब गुरूकुल में शिष्य न सिर्फ शास्त्र व शस्त्र आदि की शिक्षा ग्रहण करते थे, बल्कि अपने जीवन, परिवार व समाज से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि में किस तरह अपना योगदान कर सकते हैं, वह शिक्षा भी प्राप्त करते थे. गुरुवर सिर्फ पाठ्य विषय पढ़ाना ही अपना कर्तव्य नहीं मानते थे, वरन शिष्य का सर्वंगीण विकास उनका ध्येय होता था, ताकि वह अपना कर्तव्य भली-भांति निभा सके.
मगर शिक्षा का जो स्वरूप आज हमारे सामने है, उसने मानव समाज को “रेसकोर्स” में लाकर खड़ा कर दिया है. बच्चे रेस का घोड़ा हैं और माता-पिता रेस में दाँव लगाने वाले खिलाड़ी. जैसे घोड़े पर दाँव लगाने वाला चाहता है कि उसका घोड़ा सबसे आगे रहे, वैसे ही माता-पिता की हरसंभव कोशिश होती है कि उनके बच्चे हर परीक्षा में सबसे आगे रहें. इस वजह से बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है. जो शिक्षा माता-पिता के विचार को इतना दबावपूर्ण बना रही है, बच्चों पर उसका कितना विपरीत असर डालती होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता. आए दिन सुनने को मिलता रहता है कि परीक्षा के तनाव से छात्र ने आत्महत्या कर ली. परीक्षा में कम नंबर आने या फेल जाने के बाद विद्यार्थी ने अपनी जानलीला समाप्त कर ली. शिक्षा का काम है व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना. भय से आनंद की ओर ले जाना. फिर ये कैसी शिक्षा है,जो जाने-पहचाने भय और कुंठा की गर्त में खींच रही है. और विडंबना यह है कि हम जानते हुए भी खिंचे चले जाने को मजबूर हैं, सही वाक्य होगा, हम खिंचे जाने को उतावले हैं.
यह शिक्षा अक्षर ज्ञान से शुरू होकर रोटी-रोजगार पर समाप्त हो जाती है. यह पैसे कमाने का कौशल्य तो देती है, मगर जीवन का सच्चा सुख पाने का मार्ग नहीं दिखाती. क्या शिक्षा का कार्य सिर्फ रोटी देना है? पशु-पक्षी व अन्य जीव तो बिना शिक्षा लिए ही पेट भर लेते हैं. फिर बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए होड़ क्यों? 
शिक्षा का वास्तविक अर्थ है जीवन को आसान और आनन्दमय बनाना, परहितकारी बनाना. व्यक्ति सिर्फ स्वयं के लिए न जीकर पूरी सृष्टि के लिए जिए. वह दूसरों के काम आए. लेकिन आज की शिक्षा-व्यवस्था मनुष्य को आत्मकेन्द्रित बना रही है. वह सिर्फ अपने लिए जीना चाहता है. वह सबका जीवन अपने मनमुताबिक जीने की कभी तृप्त न होनेवाली लालसा से भरा है. इसी चाहत ने मानवीय मूल्यों का ज़बर्दस्त क्षय किया है. चारों तरफ भ्रष्टाचार, अनैतिकता और हिंसक प्रवृतियों का बोलबाला है.शिक्षा मनुष्य में नैतिक मूल्य भरती है, मगर ये कैसी शिक्षा है,जो हमें लालची,स्वार्थी और भ्रष्टाचारी बना रही है! जो जितना पढ़ा-लिखा, उतना ही अमानवीय!
हमारी वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था हमें अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर, आइपीएस और आइएस तो बनाती है, मगर अच्छा इंसान नहीं बनने देती. विद्यादान कभी सबसे बड़ा दान हुआ करता था, किंतु आज शिक्षा सबसे बड़ा व्यवसाय बन गई है.रुपयों का लाभ सबको दिख रहा है,मगर मानवीय मूल्यों का अपूरणीय नुकसान क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रहा ?!
गुरू जिनका दर्जा कभी भगवान से भी ऊपर कहा गया,आज वो गुरू अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए बस नौकरी कर रहा है. बच्चों ने क्या पढ़ा, इससे उसे कोई सरोकार नहीं, महीने के आखिर में वेतन मिल जाय. क्या शिक्षा आज के गुरू का पैशन है? नहीं. उन्होंने इसलिए शिक्षण को चुना क्योंकि इसी क्षेत्र में जीविकोपार्जन का अवसर मिला.
शिक्षा के क्षेत्र में आई इस विकृति को दूर करने और शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने की दिशा में अब थिएटरकर्मी भी जुट गए हैं. थिएटर को आमतौर पर प्रस्तुतियों-प्रदर्शनों और मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है, किंतु थिएटर ऑफ रेलेवेंस ने थिएटर को जीवन में बदलाव से जोड़ा है. थिएटर ऑफ रेलेवेंस ने अब शिक्षा के बदले और बिगड़े स्वरूप को संवारने की मुहिम शुरू की है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस के जनक मंजुल भारद्वाज ने वर्त्तमान शिक्षा पद्दति की इस विकृति को पहचाना है और उससे हो रहे तात्कालिक और दूरगामी दुष्प्रभाव और उससे बचने के उपाय को शिक्षा-समाज के बीच लाने का सूत्र प्रस्तुत किया है. उन्होंने शिक्षकों,छात्रों और पालकों के साथ-साथ पूरे समाज को इस अभियान से जोड़ा है. शिक्षा का अर्थ क्या है? शिक्षित होने का मतलब क्या है? शिक्षक की भूमिका क्या है? पालक की भूमिका क्या है? आदि विषयों पर कार्यशालाओं में लगातार काम कर रहे हैं.इसका बेहतर प्रतिसाद भी मिला है. बच्चों से लेकर पालकों-शिक्षकों सहित पूरे स्थानीय समाज में जागरूकता आ रही है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस परीक्षा में प्राप्त अंक प्रतिशत आधारित शिक्षा की जगह छात्र के मूल्य आधारित शिक्षा पर बल दे रहा है. रोजगारोन्मुखी शिक्षा को वह मूल्यपरक शिक्षा तक विस्तार देने में अग्रसर है थिएटर ऑफ रेलेवेंस.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस की कार्यशालाओं में व्यक्ति के जन्म के औचित्य से लेकर उसकी पारिवारिक-सामाजिक भूमिका तक थिएटर के माध्यम से विद्यार्थियों सहित पालकों-शिक्षकों के समक्ष उपस्थित की जाती है. आत्मविश्वास,संवेदनशीलता,सामाजिक-राष्ट्रीय उत्तरदायित्व आदि भावबोध शिक्षा के वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार कराते हैं और एक सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण करते हैं. एक ऎसा मनुष्य जो अपने साथ-साथ पूरे समाज की भलाई के लिए चाहता है. शिक्षा की यही तो भूमिका है कि वह मनुष्य को ‘स्व’ से निकालकर ‘समस्त’ से जोड़ देती है.
धनंजय कुमार