Monday, 16 July 2012



गाँव के साथ रहिए और सीखिए
Learning And Living with the village
photo by Manoj Kumar
हमारे गाँव विचार के तहत ‘गाँव के साथ रहिए और सीखिए’ नामक कार्यक्रम में आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन उन युवक-युवतियों को conceptual, operational और financial partnership देने जा रहा है, जो शैक्षणिक, सामाजिक व सांस्कृतिक सुधारों (Educational, Social and Cultural reforms)  के माध्यम से अपने गाँव का चेहरा बदलना चाहते/चाहती हैं, जो अपने गाँव को आत्मनिर्भर बनाना चाहते/चाहती हैं.
इच्छुक युवक-युवती ‘गाँव के साथ रहिए और सीखिए’ नामक कार्यक्रम में सहभागी बनने के लिए अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेज सकते/सकती हैं.
प्रोजेक्ट रिपोर्ट में प्रोजेक्ट का Concept, Planning  and  Execution  विस्तार से लिखा होना चाहिए.
कार्यक्रम की अवधि 6 और 12 माह की होगी.
आवेदनकर्ता की उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच होनी चाहिए.
प्रोजेक्ट रिपोर्ट आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन के ऑफिस के एड्रेस अथवा ईमेल पर भेजें.
पता है-
आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन
रूम न.- 1, देवनंदन पब्लिक स्कूल, जानकी नगर,जहाना मोड़, बिन्द नालन्दा. पिन कोड- 811108. Email id- aangansco@gmail.com
  
(आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन भारतीय सोसायटी एक्ट एवं ट्रस्ट के तहत पंजीकृत (पंजीकरण सं-336/2003,मुम्बई) पूर्णतया स्वदेशी, प्रकृतिपरक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक आंदोलनात्मक सृष्टिसेवी संगठन है, जिसका लक्ष्य है भारतवर्ष के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्राकृतिक और वैचारिक धरातल पर भारतीय विचार और दृष्टिकोण (वसुधैव कुटुम्बकम्) को रुपायित करना.)

Saturday, 9 June 2012


महिलाओं के साथ दूसरा दिन
Dhananjay Kumar

महिलाओं के साथ आज दूसरा दिन था. अबतक महिलाएँ सभा स्थल पर नहीं आई थीं. कुछ महिलाएँ दिखी तो, मगर काम-काज में व्यस्त थीं. जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो झेंप-सी गई, मतलब उनका उत्साह उफनने लगा. वह बाकी साथियों को जमा करने  में जुट गईं. थोड़ी ही देर में लगभग सभी महिलाएँ पहुँच चुकी थीं. महिलाओं ने कहा कि समय थोड़ा जल्दी रखा गया था, घर का काम अभी खत्म नहीं हुआ था. पहले दिन की तुलना में आज महिलाएँ काफी मुखर थीं.उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था. आज कुछ और महिलाएँ आईं थीं. जब रजिस्टर पर उपस्थित महिलाओं का नाम लिखा जाने लगा तो आज पहली बार आई महिलाओं ने भी अपना नाम लिखने को कहा. कुछ महिलाएँ जो नहीं आई थीं, उनका भी नाम लिखवाने लगीं.कि उन्हें भी रोजगार चाहिए. मैंने टोका, ‘ यह रोजगार देने के लिए नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि उपस्थिति दर्ज करने के लिए लिखा जा रहा है. पहले दिन आईं महिलाओं ने भी उन्हें समझाया.
अब समय था संवाद को आगे बढ़ाने का. जब महिलाओं से यह पूछा कि पहले दिन जो बात हुई थी, क्या उसे अपने घर में पति के साथ शेअर किया. ज्यादातर महिलाओं ने पति के साथ इस सदर्भ में बात करने की बात बताई. और उनके पतियों की प्रतिक्रिया भी सकारत्मक थी. लेकिन कुछ महिलाओं ने तल्खी से कहा कि पति से क्यों बताएँ? वह हमें कब कुछ बताते हैं..? जब हम काम करेंगे तो उनको अपने आप पता चल जाएगा.
तो बात फिर आगे वहीं से शुरु हुई कि क्या काम करना है? महिलाओं ने कहा कि हमें जो समझ में आता था, उसी दिन बता दिया था, अब आप ही कुछ कहिए. धनंजय कुमार ने तब गौ-पालन का प्रस्ताव रखा. धनंजय कुमार ने हमारे गाँव के लक्ष्य को हासिल करने के ख्याल से विशेष रणनीति के तहत ‘गौ-पालन’ के कार्य को महिलाओं के समक्ष रखा था, ताकि इन महिलाओं को कृषि कार्य से प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, जोड़ा जा सके. मैंने महसूस किया ज्यादातर महिलाओं का चेहरा बुझ गया. पूछने पर कुछ ने कहा कि ज़गह की समस्या है, तो कुछ ने कहा कि बंधन हो जाएगा. गाय पालना एक आदमी के वश की बात नहीं है, दिनभर उसी में लगे रहना होगा. गायों के चारा के लिए घास गढ़ना भी हमारे लिए ठीक नहीं है. इस पर मैने और स्पष्ट किया कि न तो ज़गह की समस्या आएगी और न ही किसी को घास गढ़ना होगा, और न ही किसी को किसी तरह का बंधन होगा. महिलाओं की उत्सुकता जागी, ‘यह कैसे संभव है? मैंने कहा, अगर आप सब महिलाएँ ग्रुप बना लीजिए, एक हो जाइए. इस पर एक महिला बोली, ‘अच्छा तो स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए कह रहे हैं...!’ मैंने कहा, नहीं, दूसरे की सहायता करने वाला ग्रुप. एक ऎसा ग्रुप जिसमें किसी एक की समस्या सिर्फ उसकी समस्या न रहे, बल्कि बाकी साथी भी उसकी समस्या को अपनी समस्या मानकर उसके समाधान में जुट जाएँ. मान लीजिए, आपका बीस साथियों का यह ग्रुप है, और इनमें से कोई एक साथी किसी समस्या से घिर जाए, तो उन्हें उस संकट के समय अकेला नहीं छोड़ देंगे, बल्कि बाकी उन्नीस साथी भी उनकी सहायता के लिए डट जाएँगी. महिलाओं को यह कुछ अजीब-सा लगा- हसुआ के बियाह में खुरपी के गीत जैसा. उनकी जिज्ञासा अबतक अनुत्तरित थी-गौ-पालन कैसे होगा? मैंने आगे रास्ता सुझाया-‘ समूह में गौ-पालन किया जाएगा. सबकी गाएँ एक गौशाले में रहेंगी,आपलोगों का यह समूह एक समिति का रूप ले लेगा. फिर एक कार्यकारिणी समिति चुनी जाएगी. समिति का सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन करा लिया जाएगा.आप सारे सदस्य जो व्यवस्था बनाएँगे, कार्यकारिणी समिति उस पूरी व्यवस्था को सँभालेगी. गायों की देखभाल के लिए दो लोग नियुक्त किए जाएँगे. अगर आप में से कोई काम करना चाहें तो वो कर सकती हैं, बदले में हर महीने वेतन मिलेगा. अन्यथा बाहर के लोगों को नियुक्त किया जाएगा. दूध, गोबर और गौमूत्र की बिक्री से जो आमदनी आएगी, वो समिति के बैंक खाते में जमा किया जाएगा, फिर सारे खर्चे काटकर जो रकम बचेगी, वह बराबर- बराबर सबके बैंक खाते में जमा करा दी जाएगी.जिस पर सिर्फ आपका अधिकार होगा.’ यह सब सुनने के बाद महिलाओं का सवाल आया कि गाएँ आएँगी कहाँ से? क्या गाय खरीदने के लिए सरकार पैसे देगी?’ मैंने कहा, सरकार भी सहायता करती है, लेकिन पहले आपलोग समूह बनाने और समूह में रहने का मन बना लीजिए, उसके बाद इस पर चर्चा करेंगे अगली मीटिंग में.         
 


महिलाओं के साथ पहला दिन

Dhananjay kumar

महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने के क्रम में हमारे गाँव के तहत धनंजय कुमार ने सबसे पहले ‘महिलाओं के साथ संवाद’ के स्तर पर काम करना शुरू किया. लोकल रिसोर्स पर्सन पिन्नु ने इसके लिए 20 के करीब महिलाओं को इकट्ठा किया था. महिलाएँ तय समय पर एक घर के एक कमरे में जमा हो चुकी थीं. महिलाओं की उम्र 25 से लेकर 60 साल तक की थी. महिलाओं में संवाद को लेकर उत्सुकता थी, हाँ बात करने में झिझक और शर्म ज़रूर महसूस कर रही थीं. धनंजय कुमार सबसे पहले इस सभा में आने की वजह जाननी चाही, तो महिलाओं ने बतलाया कि कुछ रोजगार के बारे में बात होगी, हमको कुछ काम मिल सकता है, इस वजह से यहाँ आए हैं. धनंजय ने और स्पष्ट किया, काम यानी नौकरी? महिलाओं ने हाँ में जवाब दिया. इस धनंजय ने कहा कि वह नौकरी देने वाली किसी कंपनी या भारत सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं, जो नौकरी देंगे, बल्कि वह बिना किसी नौकरी के रोजगार उपलब्ध कराने में उनकी मदद करने आए हैं.फिर पूछा कि अभी क्या काम करते हैं? सभी महिलाओं ने कहा कि अभी तो अपने घर-परिवार का ही काम करते हैं- खाना बनाना, पुरुषों-बच्चों के कपड़े धोना, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना..आदि. बातचीत के दौरान यह पता चला कि सभी महिलाएँ निम्न मध्य वर्ग से हैं. पहले सबके परिवार वाले किसान थे, मगर लगातार टूटते संयुक्त परिवार की वजह से खेत बँटते-कम होते चले गए. ये सारी महिलाएँ अभी एकल परिवार में रह रही हैं. बहरहाल, अब इतने खेत नहीं रहे कि खेती से गुजारा हो सके, इस वजह से इन महिलाओं के पति छोटा-मोटा कोई बिजनेस या छोटी-मोटी कोई प्रायवेट नौकरी करते हैं. बहरहाल जब धनंजय कुमार ने यह पूछा कि आपलोगों को काम क्यों चाहिए, तो महिलाओं ने कहा कि एक तो घर के काम करने के बाद काफी समय खाली बच जाता है, उसका कुछ इस्तेमाल करना चाहते हैं, दूसरे कुछ काम करेंगे तो कुछ कमाई होगी. क्या पति की कमाई घर-खर्च में कम पड़ती हैं?  इसपर महिलाओं ने घर-खर्च में कमी की बात तो नहीं स्वीकारीं, मगर यह ज़रूर स्वीकारा कि स्वयं का कमाया पैसा उनका होगा,जिसे वह अपनी मर्जी से जैसे चाहें,जहाँ चाहें खर्च कर सकती हैं. यह पूछने पर कि किस तरह का काम करना चाहती हैं? ज्यादातर महिलाओं ने कहा कि वैसा कोई भी काम, जिसे घर में रहकर किया जा सकता है. घर में रहकर ही क्यों, घर से बाहर काम मिले तो क्यों नहीं? महिलाओं का झिझक भरा जवाब था कि घर के काम को देखते हुए वह काम कर सकते हैं इसलिए. दरअसल, यह महिलाएँ काम तो करना चाहती हैं, मगर बिना घर-परिवार को डिस्टर्व किए.इसमें छुपा भय पति का भी था.यह पूछने पर कि क्या पति को पता है कि आपलोग काम के लिए यहाँ जमा हुए हैं? महिलाओं ने कहा- ‘नहीं. यहाँ से जाने के बाद ज़रूर बताएँगे.’ महिलाओं से जब यह जानने की कोशिश की कि कौन-कौन काम कर सकती हैं? महिलाओं ने स्टीरियो सा जवाब दिया,’ सिलाई-बुनाई-कढ़ाई का काम, अचार-पापड़ आदि बनाने का काम. धनंजय कुमार ने कहा कि ये तो महिलाओं द्वारा किया जानेवाला टिपिकल-ट्रैडिशनल काम है, कोई ऎसा काम सोचिए, जो अलग हो, जिसमें कमाई और आगे बढ़ने के ज्यादा स्कोप हों. इन्हीं बातों के साथ सभा सम्पन्न हुई, और तय हुआ कि सप्ताह में दो दिन मिला जाए...मंगलवार और शनिवार को. आज शनिवार था, इसलिए अगली मीटिंग मंगलवार को तय हुई. सभा-स्थल भी बदल दिया गया.महारानी स्थान के बाहर चौराहे पर.       

डेयरी से बदली जा सकती है गाँवों की तकदीर
धनंजय कुमार
गाँवों से श्रमशक्ति और प्रतिभा का पलायन आज भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। शहरों में बढ़ती भीड़ से शहर की सारी नागरिक सुविधापरक व्यवस्थाएँ चरमरा गई हैं. पीने का पानी उपलब्ध कराने और कचरे के निबटारे जैसी व्यवस्थाओं का संचालन भी सरकारों के लिए भारी सरदर्द बन गया है. शहर जो कभी सपनों को पूरा करने का केन्द्र हुआ करते थे,  पिछले कुछ दशकों में मुसीबत का केन्द्र बन गए हैं. महँगाई की वजह से घर में रहना मुश्किल है, तो भारी ट्रैफिक की वजह से सड़कों पर निकलना. सच कहा जाय तो हमारे शहर जेल में तब्दील हो गए हैं.
ऎसे में जरूरत है एक ऐसी अर्थव्यवस्था की जो गाँवों के युवाओं को गाँवों में ही रोजगार दे सके. गाँव की अर्थव्यवस्था सदियों से खेती और मवेशी आधारित रही है.  पिछले कुछ सालों में हमारी सरकारों ने इस ओर ध्यान ज़रूर दिया है, लेकिन उनकी दोषपूर्ण नीतियों, अगंभीर कोशिशों और नख से लेकर शिख तक व्याप्त अप्रतिम भ्रष्टाचार की वजह से अबतक कोई भी सकारत्मक परिणाम धरातल पर नहीं आ पाए हैं. सरकार की भारी सब्सिडी आधारित तमाम लाभकारी घोषणाओं-योजनाओं के बावजूद गाँवों से युवाओं का शहरों और सरकारी नौकरियों की ओर पलायन जारी है.
डेयरी एक ऐसा क्षेत्र है जिसके उत्थान से गाँवों की तस्वीर और तकदीर दोनों बदली जा सकती है। भारत सरकार ने 1970  से शुरू हुई दुग्ध क्रांति के बाद डेयरी को ज़रूर उद्योग के तौर पर देखना शुरू किया, लेकिन उसकी दृष्टि, नीतियाँ और कोशिशें दूध और दूध आधारित व्यवसाय तक ही सीमित रहीं. यही वजह है कि आज भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश में होने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेयरी उत्पादों के योगदान की अगुआई करने के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में डेयरी का जितना योगदान होना चाहिए था, नहीं है.
दुग्ध उत्पादों के वृहत बाज़ार को देखते हुए भारत का डेयरी उद्योग दूध का अधिक से अधिक दूध उत्पादन चाहता है. लिहाजा पशुपालन के क्षेत्र में देशी गायों की तुलना में ज्यादा दूध देनेवाली विदेशी नस्ल की गायों को मह्त्व दिया जा रहा है. विदेशी नस्ल की ये गाएँ दूध देने में ज़रूर बाज़ी मार लेती हैं, मगर दूध की गुणवता में पिछड़ जाती हैं. गोबर और मूत्र के मामले में विदेशी नस्ल की ये गाएँ अलाभकारी होती हैं. इनके गोबर बदबूदार होते हैं, घर आँगन को इस गोबर से लीपकर शुद्ध नहीं किया जा सकता. मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के मामले में भी विदेशी नस्ल की गायों के गोबर देशी गायों के गोबर की तुलना में कमतर हैं. इन सब के अलावा विदेशी नस्ल की इन गायों का सर्वाधिक निराशाजनक पहलू यह है कि इनके नर बच्चे न तो किसानों के काम आने लायक होते हैं और न ही बोझ ढोने के लिए बैलगाड़ी में जोते जाने लायक. इसलिए इन बछड़ों का बाज़ार मूल्य देशी गायों के बछड़ों की तुलना में नगण्य होता है. ऎसे में विदेशी गायों के ये बछड़े माँस के लिए बूचड़खानों में कटने को अभिशप्त होते हैं. वास्तव में यह कितना अमानवीय है कि जिनके दूध से हम अपनी सेहत और अर्थव्यवस्था सुधार रहे हैं, उन्हीं के बच्चों को क़त्लखानों में निर्ममता से काट रहे हैं!
जबकि देशी गायों से दूध भले ही कुछ किलो कम मिलता हो, लेकिन उसके बछड़ों से लेकर गोबर और मूत्र तक हमारे लिए उपयोगी और कीमती हैं. इनके गोबर और मूत्र का खाद व कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल कर जैविक खेती के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में भी कायाकल्प किया जा सकता है. लेकिन विडम्बना है कि गोबर और मूत्र से बनने वाली खाद और कीटनाशक की तरफ सरकार का ध्यान और प्रयास महज खानापूर्ति भर है. नहीं तो गायों से सिर्फ अधिक से अधिक दूध प्राप्त करने की दिशा में प्रयास नहीं किए जाते. ज्यादा दूध के फेर में जर्सी गायों को डेयरी के विकास के नाम पर जिस तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है, वह चिंताजनक अदूरदर्शी सोच और नीतियों का परिणाम है. यह ठीक वैसा ही है, जैसा सूरज का इस्तेमाल हम सदियों सिर्फ दिन के उजाले के तौर पर करते रहे. आज सौर-ऊर्जा को लेकर जो वैश्विक दृष्टि बनी है, वह कितनी चमत्कारिक है, यह अब अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. ठीक उसी तरह, अगर हम दूध के अलावा गोबर और मूत्र के इस्तेमाल को लेकर अपनी दृष्टि विकसित कर लें, तो जैविक माध्यम से उत्तम खेती कर न सिर्फ अर्थव्यवस्था को शिखर तक सुधार सकते हैं बल्कि भूख और भोजन में मिले केमिकल्स व पेस्टिसाइड से होनेवाली बीमारियों से भी हम मुक्ति पा सकते हैं.

   


Tuesday, 15 May 2012

आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन का प्रोजेक्ट "हमारे गाँव"


गाँवों में कभी भारतवर्ष की आत्मा निवास करती थी. हमारे गाँव ही सदियों हमारी पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी सभ्यता-संस्कृति, विचार और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने हमारे गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे गाँवों को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत बड़ी कीमत वसूली. गाँवों से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़ गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़ गया.
आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने हमारे गाँव की वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ हमारे गाँवनाम से एक अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.
‘हमारे गाँव’ नामक इस अद्भुत प्रोजेक्ट का सृजन लेखक-पत्रकार, समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने किया है. आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू हो चुका है.

Thursday, 10 May 2012


शब्दों को ज़मीन पर उतारने की
पहल शुरू की धनंजय कुमार ने

आँगन सोशिओ-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने अपने प्रोजेक्ट ‘हमारे गाँव’ को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बनाए गए इस प्रोजेक्ट की शुरूआत बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव से की गई है. दरअसल बिन्द सिर्फ एक गाँव नहीं, ब्लॉक है, जो आसपास के बीस से अधिक गाँवों की शैक्षणिक,प्रशासनिक और मार्केट की ज़रूरतों को पूरा करता है, इन गाँवों के निवासियों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करता है.
आँगन सोशिओ कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन के इस प्रोजेक्ट के सर्जक धनंजय कुमार हैं. वह पत्रकार-लेखक, विचारक व चिंतक होने के साथ-साथ फिल्म निर्देशक भी हैं. उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट को तीन चरणों में बाँटा है. फिर हर चरण को भी तीन-तीन भागों में बाँटा है, ताकि प्रोजेक्ट तय समय में धरातल पर उतर जाए.
पहले चरण के पहले भाग में गाँव में वास्तविक शिक्षा का वातावरण बनाने पर कार्य शुरू किया गया. ‘शिक्षा क्यों और कैसे?’ इस विषय पर अभिभावकों,शिक्षकों और विद्यार्थियों में दृष्टि-निर्माण को लेकर संवाद स्थापित किया गया और उन सबकी सहभागिता से विचार को व्यवहार में साकार होता देखा गया.
इस क्रम में धनंजय कुमार ने सबसे पहले शिक्षकों पर प्रयोग किए. उन्होंने जब शिक्षकों से पूछा कि बच्चों को आप क्या देना चाहते हैं ? तो आगंतुक शिक्षकों ने कहा-ज्ञान! उनको अच्छी तरह से पढ़ाएँगे, ताकि हर परीक्षा में अव्वल आएँ और आगे जाकर कुछ बन सकें. इसपर धनंजय कुमार ने शिक्षकों से पूछा कि वह बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं? शिक्षकों का जवाब था, ’वह क्या बनेंगे-डॉक्टर,इंजीनियर या कुछ और, यह तो विद्यार्थियों के परिश्रम और अभिभावकों की चाहत पर निर्भर करता है. इस पर धनंजय ने पुन: सवाल किया कि क्या बच्चे वो सब पढ़ना चाहते हैं, जो आप पढ़ाना चाहते हैं ? शिक्षक ने आसान सा उत्तर दिया बच्चे स्कूल आएंगे तो वे वो तो पढ़ेंगे ही, जो हम पढ़ाएँगे, तभी तो परीक्षा में बढ़िया परिणाम आएँगे. इस पर धनंजय ने कहा कि बच्चे अब उस तरह से नहीं पढ़ना चाहते हैं, जैसे सालों से उनको पढ़ाया जा रहा है. आज के बच्चों को उपदेश और ज्ञान नहीं चाहिए. आपसे वह दो चीज़ें चाहते हैं-एक, उनको आप अपना कीमती समय दीजिए और दूसरा अपने कान दीजिए. उनको सुनिए,वो क्या कहना चाहते हैं? और ऎसा क्यों कहना चाहते हैं ?वो आपसे क्या चाहते हैं? क्या और कैसे पढ़ना चाहते हैं? फिर उसपर चिंतन कीजिए, विश्लेषण कीजिए और कहीं व्यवधान हो, रुकावट हो, तो बच्चों को आगे का रास्ता दिखाइए/सुझाइए, उसे गाइड कीजिए. उन्हें कतई पढ़ाने की कोशिश मत कीजिए. ज़माना बदल चुका है. विचारों और जानकारियों में नित नए परिवर्तन आ रहे हैं. बच्चे आपके साथ के बगैर वो बातें जान-सीख सकते हैं. बच्चे उपदेश सुनने के बजाए खुद अनुभव कर अभ्यास करना चाहते हैं. अगर आपको लगे कि वो मार्ग से विलग हो रहे हैं या गलत रास्ते जा रहे हैं तो उपदेश देने के बजाए उनके साथ संवाद कीजिए. एक मित्र की तरह.
धनंजय कुमार ने फिर उन आगंतुक शिक्षकों के सामने सवाल रखा कि आप बच्चों से क्या लेना चाहते हैं? वे चौंके! शायद उनके सामने पहली बार यह सवाल आया था. वह कुछ जवाब नहीं दे पाए. तब धनंजय ने कहा कि न्यूटन के गति का तीसरा नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है, इसका मतलब है कि बच्चे अगर आपसे कुछ लेंगे तो अवश्य आपको कुछ देंगे..हम जैसे-जैसे उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं जीवन में गाँठें बढ़ती जाती हैं, लेकिन बच्चे गाँठ पड़ने ही नहीं देते. आपस में लड़ते-झगड़ते हैं और फिर थोड़ी ही देर में वे दोस्त भी बन जाते हैं. मतलब बच्चों से आप जीवन की गाँठें खोलना सीख सकते हैं. तो आप उनको गणित और विज्ञान के सूत्र सिखाइए, वो आपको जीवन का सूत्र सिखाएँगे.
इसके बाद धनंजय कुमार ने विद्यार्थियों के साथ संवाद शुरू किया. टीचर भी पास में ही खड़े थे. सभी विद्यार्थी सहमे हुए से थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से इसका कारण जानना चाहा, तो किसी भी विद्यार्थी ने स्पष्ट उत्तर नहीं दिया. किसी तरह के डर की बात तो नहीं की, मगर चेहरे पर डर के भाव साफ दिख रहे थे. धनंजय कुमार ने सबसे पहले विद्यार्थियों से कहा कि वह टीचर नहीं दोस्त हैं, इसलिए कोई भी बात करने में झिझकना नहीं. फिर सबको अपना परिचय दिया और विद्यार्थियों के साथ धनंजय कुमार का संवाद आगे बढ़ने लगा. सुखद आश्चर्य यह था कि थोड़ी देर में ही विद्यार्थी सहज हो गए थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से पूछा कि सबसे ज्यादा मन किस काम में लगता है- सभी विद्यार्थियों ने एक मत से कहा कि खेलने में सबसे अधिक मन लगता है. यह धनंजय के संवाद कौशल्य का ही प्रभाव था कि सभी विद्यार्थी जो कुछ देर पहले सहमे हुए थे अब सहज और मुखर सहभागी बन गए थे. अब विद्यार्थियों के बीच हँसी और ठिठोली भी शामिल हो चुकी थी. एक घंटे के इस संवाद शिविर में धनंजय कुमार के साथ विद्यार्थियों ने क्रिकेट से लेकर सूरज और महात्मा ग़ाँधी तक बात की. शिविर के समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों ने माना कि बात-बात में धनंजय सर  ने जिस तरह से पढ़ाई से हमें जोड़ दिया, उस तरह का हमारा पहला और अनोखा अनुभव है. पढ़ना बोझिल काम लगता है, मगर धनंजय सर ने पढ़ाई को खेल के जैसा मनोरंजक बना दिया. टीचर भी विद्यार्थियों में अभी-अभी आए बदलाव और उत्साह को देखकर सुखद आश्चर्य में थे.   

Tuesday, 1 November 2011

आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!


मित्रों! आज रात की ट्रेन से मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...वो गाँव जिसकी गोद में मैंने जन्म लिया,जिसकी गलियों में मैंने चलना सीखा, जिसकी हवाओं में मैंने उड़ना सीखा, जिसके स्कूल में जीवन का ककहरा सीखा,जिसकी रातों में मैंने सपने देखना सीखा,जिसकी खुश्बू ने सौन्दर्यबोध से परिचय कराया.
मित्रों, उस गाँव को आज से 27 साल पहले छोड़कर मैं शहर आया था, दुनिया की ऊँचाइयों और जीवन की गहराइयों को पढ़ने-समझने और देखने. इन 27 वर्षों में पाने की ललक में इस कदर उलझा रहा कि गाँव मेरी राह देख रहा है, इसका कभी ध्यान ही नहीं आया. गाँव से दूर पटना और फिर मुम्बई आकर मैंने क्या-क्या पाया, इसका आकलन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन क्या-क्या खोया इसका आकलन सिर्फ मैं ही कर सकता हूँ.
हिसाब लगाता हूँ,तो पाता हूँ, मैंने पाया कम खोया ज्यादा. मासूमियत खोई,जवानी खोई,सौन्दयबोध खोया, सपने देखने की आदत खोई,चलना खोया,उड़ना खोया, संस्कार खोया, परिवार खोया,इंसानियत खोई. प्रकृति खोई,आज़ादी खोई,घर खोया.....खोया...खोया...खोया...ओह सब कुछ खो दिया...! फिर से सब पाना चाहता हूँ, इसीलिए गाँव जा रहा हूँ...
लेकिन गाँव में रह रहे लोग मुझे आगाह कर रहे हैं...जिस गाँव को आप छोड़कर आप आए थे, वो गाँव भी बिल्कुल वैसा नहीं रहा. इन वर्षों में गाँव ने भी बहुत कुछ खो दिया है...बैल खो दिए, खेतों में रोपनी करती मजदूर महिलाओं के गीत खो दिए...खलिहान खो दिए...आंगन खो दिए...संयुक्त परिवार से भरा-पूरा घर खो दिया....बच्चे खो दिए... युवा खो दिए...बूढ़ों की बच्चों के साथ की खिलखिलाहट खो दी... गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों का रेला खो दिया....होली- चैता- बारहमासा खो दिया....नीम–बबूल के दातुन खो दिए...झाल-मजीरे-ढोलक की थाप खो दिए....कबीरपंथी आलाप खो दिए...खो दिए..खो दिए..
ओह ....!!! तो पाया किसने?
गाँव का टपोरी मुखिया बन गया है...लम्बी गाडी खरीद ली है..
एक साथ तीन लोगों की हत्या कर गाँव को दहशत से भर देनेवाला बदमाश जिला परिषद का अध्यक्ष बन गया है....वह लाल बत्ती की सरकारी गाड़ी से सुरक्षा-घेरे के बीच आता-जाता है.
स्कूल में बार-बार फेल होनेवाला इलाके का सबसे बड़ा ठीकेदार बन गया है...
फ्रॉड के केस में जेल जा चुका युवक सरपंच बन गया है....चोरी-चुपके देशी शराब बनानेवाला गाँव का सबसे बड़ा व्यापारी बन गया है...
कोई बात नहीं...मैं फिर भी गाँव आना चाहता हूँ...अपनी यादों को फिर से गाँव की हवाओं में बसाना चाहता हूँ.
मैं वहाँ अपनी पुश्तैनी खेती फिर से शुरू करना चाहता हूँ...अच्छा स्कूल और पुस्तकालय खोलना चाहता हूँ....पढ़ने-लिखने का माहौल बनाना चाहता हूँ....संस्कार-संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहता हूँ....चैता-फाग-बारहमासा की धुनें फिर से गुंजाना चाहता हूँ...खेतों में रोपनी-गीत गवाना चाहता हूँ...
तो आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!
 धनंजय कुमार