Sunday, 12 August 2012

मैं एक किसान हूँ


धनंजय कुमार 

मैं एक किसान हूँ. मेरे पिता और दादा-परदादा भी किसान थे. मगर तब यह देश किसानों का देश हुआ करता था. मुझे बड़ा गर्व होता था, जब मैं पिता और दादा-परदादा के बारे में सोचता था कि मेरे पूर्वज किसान थे. अनाज उपजाते थे, जो हर इंसान के जीवन का आधार है, हर आदमी की ज़रूरत है. किसान यानी सबको भोजन देने वाला !
मगर आज़ादी के बाद हम लगातार हाशिए पर आते चले गए. हमारा देश अब हमारा नहीं रहा, अंबानी-माल्या जैसे उद्योगपतियों का हो गया है. गाँवों और किसानों के बजाय यह देश अब शहरों और पूँजीपतियों का हो गया है !
भूमण्डलीकरण ने हमें और भी किनारे कर दिया है. आज हर वस्तु,हर व्यक्ति पैसों से आँका जाता है...और हम पैसेवाले नहीं हैं...विकास का मतलब बैंक बैलेंस, बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, शहरों की चमक-दमक, अंग्रेजी और अंग्रेजी पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार हो गया है...हमारा गाँव, हमारी बोली, हमारा काम, हमारा पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार, सब पिछड़ेपन का पर्याय बन गया और हम पिछड़ गए...लगातार पिछड़ते जा रहे हैं... हमारा हिन्दुस्तान आगे बढ़ता जा रहा है, रोज़ तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है, मगर हम रोज़ पिछड़ते जा रहे हैं...! इतने पिछड़ गए हैं कि मेरा बेटा भी हमें पिछड़ा मानता है! हमारे काम को हेय मानता है, क्योंकि हमारी कमाई करोड़ों में नहीं है.
बेटा इंजीनियर बन गया है, कम्प्यूटर इंजीनियर...लाख रुपए महीना कमाता है...नौकरी के एक साल बाद ही शहर में एक करोड़ का घर खरीद लिया है. मुझसे कुछ पैसे माँगे थे.- तीस साल से खेती कर रहे हैं, तीन लाख तो दीजिए.. मैं तीन हज़ार भी नहीं दे सका. बैंक बैलेंस कहाँ से होगा ! बैंक में अकाउंट भी नहीं है. बैंक को नजदीक से देखा भी नहीं है. उसने मुझे हिकारत भरा ताना दिया- क्या फायदा ऎसे काम का...? आपसे अच्छा तो हमारे ऑफिस का पियून है...!
मुझे मोतियाबिंद हो गया है. ऑपरेशन के लिए डॉक्टर ने पाँच हज़ार का खर्च बताया है. बेटे को चिट्ठी लिखी. बेटे ने पड़ोस के लड़के से मोबाइल कर कहलवाया है, ...शहर आ जाइए, पाँच नहीं, पन्द्रह हज़ार लगेगा. बढ़िया लेंस लगवा दूँगा... आप पिछड़ी हुई ही बातें करेंगे...पाँच हज़ार में देशी लेंस लगेगा, शहर आइए, पन्द्रह हज़ार का विदेशी लेंस लगवा दूँगा... मेरी आँखें अब रोज़ रोती हैं....क्या हो गया हमारे देश को..! अब देखने के लिए भी विदेशी लेंस लगवाना पड़ेगा ! क्या विदेशी लेंस से मेरा पहले वाला देश दिखेगा..? 
बेटा कहता है, खेत बेच दीजिए....यहाँ प्रॉपर्टी में सारा रुपया इंवेस्ट कर दूँगा... साल-दो साल में दोगुनी कीमत हो जाएगी.... मगर मैंने साफ मना कर दिया, मेरे मरने के बाद जो जी करे करना, मगर मेरे जीते जी मेरे बाप-दादा की ज़मीन... मेरे बाप-दादा के खून-पसीने और ज़िंदगी से सींची ये ज़मीन, ये मिट्टी, ये खेत नहीं बेचूँगा... बेटा चिढ़ गया...फिर पिछड़ा बोला...कोई बात नहीं, ज़मीन तो बच गई...!
लेकिन अब सरकार मेरे खेत को ज़बरन खरीदना चाहती है. टाटा, अंबानी या कोई विदेशी, पता नहीं कौन, यहाँ बहुत बड़ी फैक्टरी लगाना चाहते हैं. कीमत अभी के बाज़ार-भाव से काफी ज्यादा मिलेगी...मगर मुझे नहीं बेचना खेत... सरकार के लोग कहते हैं, बेचना पड़ेगा...
किसान जमा हो रहे हैं-....खेत नहीं बेचेंगे. कुछ लोग डरा रहे हैं- सरकार से नहीं लड़ सकते. उसके पास पुलिस है, सेना है, हथियार हैं, गोला-बारूद हैं...मगर हम किसानों के पास क्या है..? अपना बेटा भी चाहता है, खेत बेच दें...
कई लोग पुलिस की गोली से मारे गए...! ठीक है, मुझे भी मार दो...मरना मंजूर है, मगर खेत नहीं बेचेंगे...खेत नहीं बेचेंगे... हम किसान हैं. खेत हमारे माता-पिता हैं, पालक हैं. उसे अपने आप से अलग नहीं होने देंगे. ...मार दो गोली...मार दो गोली...मार दो गोली...
...फिर गोली चली..दस किसान मारे गए...पैंतीस की हालत गंभीर है.....
     


Friday, 3 August 2012

जड़ों की ओर

प्रस्तुत कहानी लोकप्रिय दैंनिक समाचार पत्र "जनसत्ता" के  कोलकाता संस्करण के दीपावली विशेषांक 2014 में प्रकाशित हो चुकी है.

कहानी
धनंजय कुमार
अमावस्या की रात थी. अभी थोड़ी ही देर पहले चारों ओर घुप अंधेरा था. पूरा गाँव गहरी नींद में था. कुत्ते और झींगुर भी नींद के आनंद में डूबे थे. इतना सन्नाटा था, मानो गाँव खाली हो गया हो...कि तभी तेज उजाला फैला...ऎसा उजाला, जिसमें खलिहान में रखी रबी फसल धू-धू कर जलने लगी...सन्नाटे के बीच नगाड़े की तरह चीख-पुकार गूँज उठी... ‘दौड़ो...बचाओ..आग लग गई रे ...
सोता गाँव अचानक दौड़ पड़ा. जिसके हाथ जो आया, बाल्टी, लोटा, तसला...हर कोई पानी भरकर उस तरफ भागा, जिस तरफ आग की लपटें दिख रही थीं. मगर इतने पानी से क्या होने वाला था...! घर से भरकर ले जाया गया पानी ऊँट के मुँह में जीरे की तरह हुआ.
गर्मियों की यही तो त्रासदी है, खत्ता-पोखर तो क्या कुएँ तक सूख जाते हैं. ऊपर से जबसे सरकार ने गाँवों में चापाकल लगवाना शुरू किया है, तबसे कुओं की हालत और भी बुरी हो गई है. पहले गर्मी की शुरूआत में ही कुओं की उड़ाही होती थी. कुओं में सालभर का जमा कचरा-कीचड़ गाँव के लोगों की सहभागिता से साफ किया जाता था, और कुआँ रिस-रिस कर आते पानी से फिर ज़रूरतभर भर जाता था. ऎसी क्या इससे भी भयानक अगलगी पहले भी कई बार हो चुकी है, लेकिन तब एक साथ बीसियों बाल्टियाँ पानी के लिए कुएँ में कूद पड़ती थीं. कई बार तो डीजल इंजन चलाकर भी पानी जुटाया गया. मगर आज किसी कुएँ में पानी का दरस तक नहीं था.
सब चापाकल की तरफ भागे, मगर वह भी खराब पड़ा था. लोग दूसरे चापाकल की तरफ भागे. सब बर्तन लेकर जमा हो गए. कारू फटाफट चापाकल का हैंडल चलाने लगा. रब्बू गुस्से से बोला, ‘अरे यार इस तरह पानी भरते रहे, तबतक तो सब खतम हो जाएगा. सब लोग एक ही ज़गह जमा मत रहो. कुछ लोग ठाकुरबाड़ी के पास वाले चापाकल से पानी भरकर लाओ, कुछ लोग बसस्टैंड के पास वाले चापाकल की तरफ भागो.’
आग फैलती ही जा रही थी. कुछ लोग खलिहान में रखे गेहूँ, चने, मसुरी आदि फसलों के ढेर को दूर हटाने में लगे थे. मगर आग उन सबसे कई गुना ज्यादा अपने अँकवार में भर रही थी. लोग आग पर पानी फेंक रहे थे, मगर आग का बाल भी बाँका नहीं हो पा रहा था. बटोही की माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी, ‘ सब बर्बाद हो गया रे....भगवान, ये तुमने क्या जुलुम कर दिया… हम गरीबों ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा..? हाय रे हमारी दिल्ली की कमाई भी लुट गई..! मेरा लाल दिल्ली में मर-मर कर चार पैसा कमाता है, बीस हज़ार रुपया भेजा था, कमसे कम तीन बीघा खेत पट्टे पर ले लेना....खाने भर तो उपज जाएगा...उपजा तो बड़का दिन रात एक करके गेहूँ उपजा लिया, मगर सब खाक हो गया रे बेटा...! कितनी बार मना किया कि मत कर खेती....खेती में फायदा नहीं है, फायदा ही होता तो सब बड़े किसान खेती छोड़ते....!’
बटोही की माँ सोलह आने सच बोल रही थी. इस गाँव में 10 बीघा से लेकर 150-200 बीघा जोत वाले किसान हैं, मगर अब कोई खेती नहीं करते. ज़मींदारी खत्म होने और हरित क्रांति के बाद यहाँ के किसानों में भी खेती को लेकर ज़बरदस्त उत्साह था. वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही किशोरी मिस्त्री, सूरज मिस्त्री और भोनू मिस्त्री अपने-अपने घर के बाहर हल बनाने में जुट जाते थे. चारों तरफ घेर कर बैठे लोग खेती की चर्चा करते नहीं थकते थे.
गाँव के चारों ओर दूर तक फैले खेत विभिन्न फसलों से जब श्रृंगार करते थे, तब गाँव एक खूबसूरत टापू में बदल जाता था. ऎसा लगता था मानों प्रकृति ने यहीं अपना बसेरा बसा लिया हो.
फसल कट जाने के बाद झुंड के झुंड गाएँ खेतों में चरने उतरती थी, तो लगता था, अपने बाल सखाओं के साथ स्वयं कृष्ण अवतरित हो गए हों.
प्रकृति की मार किसानों पर पहले भी पड़ती थी- कभी बाढ़, तो कभी सूखा, तो कभी अगलगी...लेकिन किसान फिर भी धरती माता की गोद से अपने भरण-पोषण भर अनाज उठा लेते थे. लेकिन पहले सरकार की बेरुखी, उसके बाद मजदूरों का पंजाब की तरफ पलायन, फिर ग्लोबलाइजेशन के आते ही शहरों के प्रति लोगों के आकर्षण ने किसानों के सामने समस्या ही समस्या खड़ी कर दी. अनिश्चित खेती से त्रस्त किसानों ने अपने बाल-बच्चों को किसानी के बजाय डॉक्टरी, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने और सरकारी नौकरियों के लिए प्रोत्साहित किया. जो किसान बराहिल, पटवारी और नौकर रखते थे, उनके बेटे ही नौकरी के लिए शहरों की ओर भागने लगे. जिनके खेतों में काम करके गाँव के सारे मजदूर अपना भरण-पोषण करने के साथ-साथ ब्याह-शादी से लेकर मरनी हरनी के काज भी इच्छानुसार कर लेते थे,.वे मालिक ही गाँव छोड़कर भागने लगे तो फिर बेचारे मजदूरों की क्या बिसात कि गाँव में रहकर अपना जीवन सुकून से जी लेते. पहली बार जब बंगाली बाबू के बेटे राजीव को डॉक्टरी की नौकरी मिली थी, तब पूरे गाँव के लिए वह उदाहरण बन गए थे. फिर तो डॉक्टर,इंजीनियर से लेकर बैंक के क्लर्क तक की झड़ी लग गई. मजूरटोली के कई लड़कों ने भी सिपाही से लेकर दारोगा तक की नौकरी पर कब्ज़ा जमाया. और देखते ही देखते गाँव युवाओं से खाली हो गया. आज गाँव में सिर्फ वही लोग रह गए है, इन्हें छूट गए कहना ज्यादा सही होगा, जो या तो बूढ़े हैं या अनपढ़. आज गाँव के हर घर का कोई न कोई सदस्य ज़िला मुख्यालय से लेकर राजधानी दिल्ली में नौकरी कर रहा है या नौकरी की तलाश कर रहा है. इस कारण अब ज्यादातर खेत परती ही रहते हैं, या फिर एक ही फसल दलहन लगाई जाती है. दलहन लगाने में ज्यादा झंझट नहीं है. खेत को जोतकर बीज छींट दिए...बस. न निकौनी की ज़रूरत न खाद-पानी की. फसल पकने के बाद कटनी के वक़्त मजदूरों की समस्या भी नहीं आती है. मजदूर बिन बुलाए भी चले आते हैं. जबकि यही मजदूर गेहूँ या धान काटने के लिए बुलाने पर भी आना-कानी करते हैं. इसलिए बुजुर्ग हो चुके ज्यादातर किसान दलहन ही लगाते हैं. धान-गेहूँ उन्हीं के बूते की बात है, जो खुद परिवार सहित  खेती में लग सकते हैं. इनमें लगभग सभी भूमिहीन लोग ही हैं,जो पहले खेतिहर मजदूर थे, या जिनमें बाप-दादाओं के ज़माने से खेती-किसानी को लेकर ललक थी. ये लोग खेती छोड़ चुके या छोड़ रहे किसानों से दो या तीन बीघा खेत नगद रकम चुका कर पट्टे पर सालभर के लिए ले लेते हैं और फिर धान-गेहूँ की पारम्परिक खेती करते हैं. ये बिना लाभ-हानि जोड़े फसल उपजाते हैं और अच्छी उपज पर खुशी से भर जाते हैं. जिन खलिहानों में आग लगी है, वे सब ज्यादातर ऎसे ही गरीब किसानों के खलिहान हैं.
आग की लपटें अब भी उठ रही थीं. लोटा, तसला और बाल्टी भर-भरकर पानी लानेवाले अब निराश हताश हो चुके थे. सारी फसल आग की लपेट में आ चुकी थी. आग की लपटें कम होती जा रही थीं. चीख-पुकार, शोर-शराबा भी थम चुका था. अजीब-सा सन्नाटा पसरा था. किसानों के खून-पसीने की गंध हवा में घुलकर देवताओं को दी जानेवाली आहुति के धुएँ की तरह वातावरण को सुवासित कर रही थी. 
पिछले पाँच महीने की मेहनत और सपने कुछ घड़ी में जलकर खाक हो गए थे.  
मदनपुर गाँव में लगी इस भयानक आग की खबर यूँ तो दूसरे दिन प्रदेश के हर अखबार में पहले पेज पर छपी थी. भले वह सिंगल कॉलम में थी, लेकिन दिन–रात चलने वाले राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर इसकी कोई खबर नहीं थी. वहाँ राहुल गाँधी के सरकार में कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी लेने की संभावना पर कयास और बहस के दौर चल रहे थे. मदनपुर गाँव के पंचायत भवन में लगे रंगीन टीवी पर अपने गाँव की खबर देखने के लिए आज भीड़ लगी थी. मगर अपनी कोई खबर न पा निराशा हुई. राहुल गाँधी की खबरों-बहसों से बदबू आने लगी, सो टीवी बंद कर दिया गया.
गर्मी के महीनों में खलिहानों में आग लगना आम बात है. यही वजह थी कि सरकार से लेकर ब्लॉक के अफसर तक इस घटना को दुभाग्यपूर्ण बता अपनी दिनचर्या में फिर से रम गए थे. लेकिन बिहार टाइम्स का रिपोर्टर अविनाश अभी भी बेचैनी महसूस कर रहा था. सरकार और उनके थोथे बयानों से उसे घिन आ रही थी. आखरी आदमी की आँखों के आँसू पोछने के संकल्प के साथ शासन कर रही सरकार, उनके मंत्री और अधिकारी इतने असंवेदनशील कैसे हैं..!
’तो क्या चाहते हैं, हम भी जल मरें...! बीडीओ ने बड़ी हिकारत से जवाब दिया.
’किसानों के खलिहान हर साल यूँ ही प्रदेश में कहीं न कहीं खाक होते हैं...आपलोग खानापूर्ति कर चुप हो जाते हैं. कोई ठोस इंतज़ाम क्यों नहीं करते ?’ अविनाश ने शांति से पूछा.
‘प्रभावित किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा भी कर दी गई है.’
‘मुआवजा समाधान नहीं है बीडीओ साहब. आग न लगे और लगे तो जल्दी उस पर काबू पा लिया जा सके, आप इसके लिए कोई ठोस इंतज़ाम कीजिए.’
‘आप क्या चाह्ते हैं, हर गाँव में फायर ब्रिगेड का ब्रांच खोल दिया जाय..? तो बात कीजिए मंत्री जी से. हम तो उनके आदेशपाल भर हैं. जैसा वो कहेंगे हम करेंगे. शायद मंत्री जी आपकी बात सुनें. अब हमको हमारा काम करने देंगे..? सोमवार को मंत्री जी अपने हाथों किसानों को मुआवजा राशि बाँटने आ रहे हैं.’
प्रभावित किसानों के बीच मुआवजा राशि बाँटे जाने के दिन ब्लॉक के पास लगे मंच पर खूब हंगामा हुआ. सूची में उन्हीं किसानों के नाम थे, जिनके अपने खेत थे और जिनके पास एलपीसी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट अथवा खेत की रसीद थी. मुआवजा पानेवालों की सूची में अपने आप को न पाकर कई किसान उग्र हो गए. मंत्री जी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनेवाली पुलिस को मंत्रीजी को सुरक्षित बाहर ले जाने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा. मगर किसानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाला चूँकि खुद ही जान बचाकर भागने में परेशान था, इसलिए पचास से अधिक किसान घायल हुए. रामदीन और गिरधारी की हालत गंभीर है. सर में चोट आई है. पटना के सरकारी अस्पताल में उन्हें भर्ती किया गया है.
मंत्री जी ने इस हंगामे के लिए उन किसानों को ही दोषी ठहराया कि हंगामा करनेवाले लोग किसान नहीं, बल्कि विरोधी दल के कार्यकर्ता और भाड़े के लोग थे. राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर हंगामा, लाठीचार्ज और मंत्री जी का बयान ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर चलाया गया. शाम होते-होते बहस के लिए विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं के साथ पैनलिस्ट भी जमा हो गए.खूब गर्मागर्म बहसे हुईं, मगर पंचायत भवन में रंगीन टीवी देख रहे भुक्तभोगी ग्रामीणों को कुल मिलाकर इतना ही समझ में आया कि सब तमाशा है और वे सब जमूरे.
इस तरह की टीवी रिपोर्टिंग से बिहार टाईम्स के संवाददाता अविनाश कुमार को बहुत गुस्सा आ रहा था. ‘अपना भारत’ के बिहार ब्यूरो चीफ प्रकाश कुमार उसका खास मित्र है. अविनाश का मन किया ऎसी घटिया और झूठी रिपोर्टिंग के लिए प्रकाश को खूब गालियाँ दे. मगर मन मसोसकर रह गया. अविनाश कुमार को इस लिए भी ज्यादा गुस्सा आ रहा था कि वह खुद भी एक किसान परिवार से था. वह किसानों की स्थिति-परिस्थिति से अच्छी तरह वाकिफ था. उसके पिताजी बीस बीघा जोत वाले साधारण, लेकिन मेहनती किसान थे.
कई साल पहले, जब अविनाश छोटा सा था-तीन या चार साल का, गाँव में भयंकर बाढ़ आई थी. गाँव के चारों ओर लगी धान की फसल डूब गई थी. उफनती नदी का तटबंध न टूटे इसके लिए गाँव के किसानों और मजदूरों ने दो दिन लगातार गुमाम किया था. जहाँ भी तटबंध कमजोर दिख रहा था, पानी रिस रहा था, वहाँ मिट्टी डालकर तटबंध को मजबूत बनाया जा रहा था. पिछले दस दिनों से बरसात लगातार हो रही थी. सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अब बस करो भगवान! इतना पानी बहुत है. लेकिन शायद भगवान किसानों से नाराज़ थे. बरसात बंद हो इसके लिए बच्चों ने नंगी देह पर कालिख पोत पूरे गाँव की गलियों में घूम-घूम कर टीन बजाने का टोटका भी किया, मगर भगवान की नाराज़गी कम नहीं हुई. नदी में पानी बढ़ता ही जा रहा था. तीन दिन दो रात किसान की भगवान से लड़ाई चलती रही. आखिरकार भगवान की ही जीत हुई. भगवान गणेश की सवारी चूहे का इसमें अद्भुत योगदान रहा. चूहों ने तटबंध में सैकड़ों- हज़ारों बिल बना रखे थे. और यही बिल अंतत: तटबंध टूटने का कारण बना. किसान-मजदूर दूर खड़ा हो अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहे. देखते ही देखते पूरी नदी फसल लगे खेतों की ओर मुड़ गई.
हफ्ते बाद नदी का गुस्सा जब थमा, तब जाकर खेतों से पानी हटा. लेकिन तबतक सबकुछ बर्बाद हो चुका था. नदी के अगल-बगल के खंधों में धान की जगह बालू के ऊँचे-ऊंचे टीले दिखाई दे रहे थे. किसानों ने अपना सर पीट लिया.
अविनाश के पिता ने मगर हार नहीं मानी. जब बरसात बीत गई, वह अपने बैलों और हलवाहों के साथ बालू के टीलों के खिलाफ भिड़ गए. उनके साथी किसानों ने ऎसा करने से मना किया, कि इन खेतों से बालू हटाकर उपजाऊ बनाना नामुमकिन है. मगर उनके सामने कोई और रास्ता नहीं था. बाकी किसानों के कुछ खेत तो बचे थे, लेकिन उनके सारे खेत बर्बाद हो गए थे.खेत को यूँ ही छोड़ने का मतलब था परिवार को भूखों मारना. घर में जमा अनाज से एक साल परिवार को खिलाया जा सकता था, उसके बाद....? अविनाश के पिता के चारों ओर अंधेरा छा गया. उन्होंने तय किया उन्हें हर हाल में अंधेरे से लड़ना है. मगर साथ में यह भी तय कर लिया कि अविनाश को खेती नहीं करने देना है.
खुद खेतों में कभी बाढ़ कभी सूखा कभी अगलगी से जूझते रहे, मगर अविनाश को पटना में रहकर पढ़ाई करने में कभी किसी तरह की कमी नहीं आने दी. उनके साथी किसान अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस, आईपीएस बनाना चाहते थे,मगर वह अविनाश को सिर्फ पढ़ने के लिए मोटीवेट करते रहे. क्या बनना है, इसका निर्णय अविनाश को ही लेने की आजादी दी. अविनाश ने पत्रकार बनना पसंद किया. पत्रकार की स्वतंत्रता से वह बड़ा फेसिनेटेड था. एक कमजोर से कमजोर आदमी के भी दुख, शोषण और चाहत को वह देश दुनिया के सामने अभिव्यक्त कर सकता था.
हालाँकि यह देखने के लिए उसके पिता ज़िंदा नहीं रहे. एक मनहूस सुबह अविनाश को फोन पर खबर मिली कि उसके पिता का निधन हो गया है. अचानक उसके सामने घनघोर अंधेरा छा गया था. चेतना लौटी तो उसे समझ में आया कि उसके पिता किस तरह खुद को जला उसके जीवन में उजाला भर रहे थे.
नौकरी की तलाश में जब वह निकला तो तुरंत ही उसे प्रदेश के सबसे बड़े अखबार बिहार टाईम्स में जगह मिल गई. उसमें वह पहले भी कई आलेख लिख चुका था. संपादक उसकी लेखन शैली और भाषा के प्रशंसक थे. मामूली से मामूली खबर को भी अविनाश ऎसा मानवीय दृष्टिकोण देता था कि साथी पत्रकार भी कायल हो जाया करते.
अविनाश मदनपुर की इस अगलगी और उस पर रिपोर्टिंग से बहुत अपसेट था. उसने तय किया कि अब वह सारा सच लिखेगा. सरकारों की नाकामियाँ, नेताओं की राजनीति, अफसरों की मंत्रियों के प्रति स्वामीभक्ति, किसानों का दुख और पत्रकारों की कुंद और चाटूकार पत्रकारिता सब पर वह बेबाकी से लिखेगा.
फर्स्ट पेज इंचार्ज अखिलेश को उसने पहले ही बता दिया था कि बॉटम के लिए एक सीरिज स्टोरी दे रहा है, कमसेकम पाँच किश्त में जाएगी. अखिलेश खुश हुआ कि पाँच दिन के लिए बॉटम स्टोरी का टेंशन खत्म हुआ.
अविनाश की आँख आज सुबह थोड़ी देर से खुली. स्टोरी लिखने के बाद उसे सुकून मिला था. बेडरूम में सूरज की रोशनी चमक रही थी. वह बेडरूम से बाहर आया और वॉश बेसिन के पास आ कुल्ला किया चेहरा धोया, फिर माँ को आवाज दी, ‘ माँ चाय बनाना.’ माँ किचन में खाना बनाने में जुटी थी.
अविनाश बालकनी में आ गया.अखबार आया हुआ था. अखबारवाला रोज सड़क से ही बालकनी में अखबार फेंक जाता है. वहीं कुर्सी पर बैठ कर वह अखबार देखने लगा. मुख्यमंत्री की सेवायात्रा और वहाँ की गई घोषणाएँ अखबार की लीड स्टोरी थी. पिछले तीन दिनों से रोज इसी तरह की न्यूज लीड बनाई जा रही थी. दो पत्रकार संजीव और आकाश मुख्यमंत्री की यात्रा और उनकी घोषणाओं को कवर करने के लिए अखबार द्वारा डिप्यूट किए गए थे. अविनाश को लीड स्टोरी बिल्कुल पसंद नहीं आई. उसे लगा यह लीड नहीं बल्कि लीद है. उसने संपादक से एक बार कहा भी था कि इस तरह की न्यूज अखबार की विश्वसनीयता को कम करते हैं. जिस तरह से मुख्यमंत्री और उनकी घोषणाओं को लीड बनाकर छापा जा रहा है, उससे लगता है कि यह अखबार नहीं, मुखपत्र है. मगर संपादक ने अविनाश से यह कहकर पीछा छुड़ा लिया था कि समय के साथ चलने में ही होशियारी होती है अविनाश...! जब तुम संपादक बनोगे, तब समझ में आ जाएगा.’ लीड न्यूज की हेडलाइन पढ़ने के बाद बिना पूरी खबर पढ़े वह बॉटम न्यूज की तरफ बढ़ गया. उसे झटका-सा लगा. बॉटम में उसकी स्टोरी की जगह कृषि मंत्री की किसी बिजनेसमैन के साथ खींसे निपोड़े तस्वीर के साथ ऑर्गेनिक सब्जी मुम्बई भेजे जाने के करार की खबर छपी थी. उसने अखबार पलटकर देखा, बैक पेज पर बिपाशा बसु की लगभग अधनंगी बड़ी-सी तस्वीर के साथ उसका इंटरव्यू छपा था. उसे बड़ा गुस्सा आया. उसने तुरंत अखिलेश को फोन लगाया, पता चला वह अभी तक सो रहा है. घड़ी देखी साढ़े सात बजे थे. फर्स्ट पेज इंचार्ज होने की वजह से वह देर रात घर लौटता है, इसलिए रोज ही वह सुबह देर से जागता है. पत्नी ने फोन उठाया था, उसी ने अविनाश को यह जानकारी दी. ‘ कुछ ज़रूरी बात है, तो उन्हें उठाऊँ क्या? पत्नी ने पूछा. अविनाश ने हाँ कहना चाहा, मगर कुछ सोचकर ना कह दी. उसे बड़ा गुस्सा आ रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था, आखिर उसकी स्टोरी क्यों नहीं छापी गई. इसी बीच मोबाइल रिंग हुआ. अखिलेश का कॉल था. उसने अविनाश के सामने लगभग सफाई दी, ‘ सॉरी यार, मैं तुम्हारी स्टोरी अपने पेज पर नहीं लगा सका.’ संपादक जी ने कहा कि इसे रीजनल पेज पर दे दो. इसलिए मैंने तुम्हारी स्टोरी अनिल को दे दी है. आज स्टोरी लगाएगा वो. सॉरी यार, मुझे दोषी मत मानना.’ अविनाश प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोला. चुपचाप कॉल कट कर दिया. अविनाश के भीतर ठीक वैसी ही आग लगी थी, जैसी मदनपुर के खलिहान में लगी थी. खलिहान में आग कैसे लगी थी, यह किसानों को पता नहीं था, मगर अविनाश के मन-मस्तिष्क में आग लगानेवाला उसी के अखबार का संपादक था. उसी संपादक ने उसकी लेखनी से प्रभावित होकर दो साल पहले उसे नौकरी पर रखा था. तब वह कितना सज्जन और सहृदय लगा था, मगर आज संपादक पर बहुत गुस्सा आ रहा था उसे. उसने तय किया ऑफिस जाते ही संपादक से जवाब माँगेगा.
शाम पाँच बजे अक्सर वह अपने दफ्तर पहुँचता था, लेकिन आज वह तीन बजे ही दफ्तर आ गया था. संपादक अपनी केबिन में खिलखिला-खिलाकर फोन पर किसी से बात कर रहे थे. अविनाश बिना अनुमति आज केबिन में घुस आया था. संपादक को भी उसका आना सहज नहीं लगा. उसने ‘अच्छा थोड़ी देर बात फोन करता हूँ’ सामनेवाले को ऎसा कह अविनाश की तरफ मुखातिब हुआ, ‘क्या बात है अविनाश..?’
‘सर, मेरी स्टोरी आपने फर्स्ट पेज से क्यों हटवा दी..?’
‘क्योंकि वह फर्स्ट पेज की स्टोरी नहीं थी. तुम्हारी लिखी स्टोरी थी, इसलिए मैंने रीजनल पेज के लिए फॉरवर्ड कर दी, वरना वो छपती भी नहीं.’
’क्यों सर..?’
‘अविनाश तुम दो साल से इस अखबार में काम कर रहे हो, अभी तक तुम्हारे अंदर न्यूज सेंस डेवलप नहीं हुआ है. गाँव और किसान-मजदूर की स्टोरी कौन पढ़ता है? वे खुद अखबार नहीं पढ़ते.’
‘तो क्या बिपाशा बसु आपका अखबार पढ़ती है..? उसे क्यों पूरे पेज में छापा है?’
‘क्योंकि पाठक उसे पढ़ना चाहते हैं. हमारे अखबार के असली खरीदार शहरी पाठक हैं. गाँव के लोग हमारे खरीदार नहीं हैं. अखबार निकालते वक़्त हमेशा इस बात को ध्यान में रखना होता है.’
‘सर, अखबार निकालने और बनियागिरी में कुछ तो फर्क होता होगा...!
संपादक चिढ़ गया, ‘ तो तुम अखबार और बनियागिरी में फर्क मुझे बतलाओगे? तुम क्या समझते हो, बड़ी-बड़ी आदर्श की बातें करने से अखबार चलता है? जिन गरीब लोगों पर तुम स्टोरियाँ लिखते हो, उनके पैसे से यह अखबार का कागज़ भी नहीं खरीदा जा सकता है...! तुम्हें हर महीने बीस हज़ार की जो सेलरी मिलती है, वो कहाँ से आती है, पता है तुम्हें..?’
अविनाश को लकवा–सा मार गया. उसने सचमुच ऎसा कभी सोचा नहीं था. उसे अपने आप से भी दोगलेपन की बदबू आने लगी. वह चुपचाप संपादक के कमरे से बाहर निकल आया.
वह अपने फ्लैट पर लौट आया. इतनी जल्दी आया देख माँ आश्चर्य से बोल पड़ी, ‘ अविनाश आज बहुत जल्दी दफ्तर से आ गए... तबियत तो ठीक है न...?’
‘माँ सामान बाँधो, हम अपने गाँव चलेंगे...’ अविनाश अपने कपड़े समेटने लगा.
माँ को कुछ समझ में नहीं आया...वह चुप रही. फिर अविनाश ही बोला, ‘ माँ, हम खेती करेंगे. अपनी मेहनत और पसीने की कमाई तुम्हें खिलाना चाहते हैं माँ...हाँ माँ, हम खेती करेंगे...’ वह माँ से लिपट गया. उसकी आँखों में आँसू थे.

                   



















Thursday, 19 July 2012

हमारे गाँव


 हमारे गाँव
हमारे गाँव पत्रकार-लेखक-फिल्मकार,समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार द्वारा सृजित, विस्तारित और क्रियान्वित विचार है।
·         हमारे गाँव, एक ऐसी (अवधारणा) संकल्पना है, जिसके माध्यम से किसी भी अविकसित गाँव को विकास की पटरी पर तेजी से दौड़ाया जा सकता है। यह गाँव को आत्मनिर्भर बनाता है। गाँव में रोजगार पैदा करता है, खुशहाली लाता है और ग्रामवासियों में आत्मविश्वास का अद्भुत संचार करता है।
·         यह गाँव का सर्वांगीण विकास करता है और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक विकास के साथ-साथ राजनीतिक व सांस्कृतिक विकास को भी समुचित महत्व देता है।
·         यह अभावों, अव्यवस्थाओं, कुरीतियों, दुराग्रहों, सरकारी मशीनरी की  अकर्मण्यता आदि का रोना नहीं रोता, बल्कि अपने कर्म, कर्त्तव्यनिष्ठा और कौशल्य के सहारे सतत् चुनौतियों से लड़ता आगे बढ़ता है।
·         यह खेती,जो कि किसानों के लिए घाटे का कारोबार बनी है, उसे लाभ में तब्दील करता है।
·         हमारे गाँव के माध्यम से किसान आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर अनाज, सब्जियों, फूलों और फलों आदि के अधिकतम उत्पादन प्राप्त करते हैं।
·         हमारे गाँव के माध्यम से किसान अपने उत्पादों की स्वयं मार्केटिंग करते हैं और बाजार से वाजिब मुनाफा कमाते हैं। इस तरह से उत्पादक और उपभोक्ता सीधे मिलते हैं, और दोनों फायदे में रहते हैं।
·         यह आम आदमी से लेकर खास आदमी तक की सेहत से सरोकार रखता है। इसलिए आर्गेनिक फार्मिंगको अपनाता है और नाश्ते व भोजन में छिपे केमिकल्स और पेस्टिसाइड की उपस्थिति को न्यूनतम करता है। यानी यह उत्पादक और उपभोक्ता दोनों की अच्छी सेहत का ध्यान रखता है।
·         यह गाँव से शहर की ओर हो रहे अंधाधुंध पलायन को रोकता है। पलायन की वजह से मजदूरों और प्रतिभाओं की कमी झेल रहे गाँवों और बढ़ती आबादी की मार सह रहे नगरों-महानगरों, दोनों को राहत मिलती है।
·         यह आर्थिक विषमताओं को खत्म करने में सक्षम है। आर्थिक प्रगति की धुरी,जो सिर्फ महानगरों में घूमती है, यह उसे गाँवों में स्थापित करता है। आज अर्थ का प्रवाह नगर से गाँव की तरफ है, यह अर्थ के प्रवाह को दोतरफा बनाता है। यानी पैसा नगर से गाँव की  तरफ आता है, तो पैसा गाँव से नगर की तरफ भी जाता है।
·         यह गाँव का कुछ इस तरह विकास करता है कि गाँव का गँवई सौन्दर्य भी बना रहता है और शहर की सुविधाएँ भी उपलब्ध हो जाती हैं।
·         यह राष्ट्र के विकास के लिए अभिशाप मानी जा रही आबादी को वरदान में परिवर्तित करता है।
·         हमारे गाँव का अंतिम लक्ष्य है पूरे विश्व से भुखमरी का नामोनिशान मिटाना और पूरी सृष्टि को खुशहाल बनाना। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।के सदविचार को साकार करना।
·         यह इस भ्रांति को तोड़ता है कि पैसा कमाना है, तो शहरों का रुख करना पड़ेगा। साथ ही, यह साबित करता है कि गाँवों में भी अच्छी जिन्दगी जीने लायक पैसा कमाया जा सकता है।
·         यह इस भ्रांति को भी तोड़ता है कि शहरों में मिलने वाली सुविधाएँ गाँवों में नहीं विकसित की जा सकतीं।
·         यह गाँव की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभारने के लिए उचित वातावरण और सहयोग का निर्माण करता है।
·         यह व्यक्ति को समाज व राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी और कर्त्तव्यनिष्ठ बनाता है।
·         यह प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग करता है और प्राकृतिक संपदाओं का कोई नुकसान न हो, इसका घ्यान रखता है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से पहले भरपाई की व्यवस्था करता है।
·         यह ग्रामीण समाज में पारंपरिक संयुक्त परिवार को पुनर्स्थापित करता है। इस तरह से नित एकल परिवार की त्रासदी के शिकार हो रहे बुजुर्गों के जीवन में पुनः खुशियाँ लौटाता है।
·         यह आधुनिक समाज के इस दुराग्रह को तोड़ता है कि परिवार  व्यक्ति के लिए बोझ है, पाँव की बेड़ी है, और यह साबित करता है कि जैसे कहावत में एक से भले दो होते हैं, वैसे ही एक व्यक्ति से भला एकल परिवार होता है और एकल परिवार से भला संयुक्त परिवार।




Monday, 16 July 2012



गाँव के साथ रहिए और सीखिए
Learning And Living with the village
photo by Manoj Kumar
हमारे गाँव विचार के तहत ‘गाँव के साथ रहिए और सीखिए’ नामक कार्यक्रम में आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन उन युवक-युवतियों को conceptual, operational और financial partnership देने जा रहा है, जो शैक्षणिक, सामाजिक व सांस्कृतिक सुधारों (Educational, Social and Cultural reforms)  के माध्यम से अपने गाँव का चेहरा बदलना चाहते/चाहती हैं, जो अपने गाँव को आत्मनिर्भर बनाना चाहते/चाहती हैं.
इच्छुक युवक-युवती ‘गाँव के साथ रहिए और सीखिए’ नामक कार्यक्रम में सहभागी बनने के लिए अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेज सकते/सकती हैं.
प्रोजेक्ट रिपोर्ट में प्रोजेक्ट का Concept, Planning  and  Execution  विस्तार से लिखा होना चाहिए.
कार्यक्रम की अवधि 6 और 12 माह की होगी.
आवेदनकर्ता की उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच होनी चाहिए.
प्रोजेक्ट रिपोर्ट आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन के ऑफिस के एड्रेस अथवा ईमेल पर भेजें.
पता है-
आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन
रूम न.- 1, देवनंदन पब्लिक स्कूल, जानकी नगर,जहाना मोड़, बिन्द नालन्दा. पिन कोड- 811108. Email id- aangansco@gmail.com
  
(आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन भारतीय सोसायटी एक्ट एवं ट्रस्ट के तहत पंजीकृत (पंजीकरण सं-336/2003,मुम्बई) पूर्णतया स्वदेशी, प्रकृतिपरक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक आंदोलनात्मक सृष्टिसेवी संगठन है, जिसका लक्ष्य है भारतवर्ष के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्राकृतिक और वैचारिक धरातल पर भारतीय विचार और दृष्टिकोण (वसुधैव कुटुम्बकम्) को रुपायित करना.)

Saturday, 9 June 2012


महिलाओं के साथ दूसरा दिन
Dhananjay Kumar

महिलाओं के साथ आज दूसरा दिन था. अबतक महिलाएँ सभा स्थल पर नहीं आई थीं. कुछ महिलाएँ दिखी तो, मगर काम-काज में व्यस्त थीं. जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो झेंप-सी गई, मतलब उनका उत्साह उफनने लगा. वह बाकी साथियों को जमा करने  में जुट गईं. थोड़ी ही देर में लगभग सभी महिलाएँ पहुँच चुकी थीं. महिलाओं ने कहा कि समय थोड़ा जल्दी रखा गया था, घर का काम अभी खत्म नहीं हुआ था. पहले दिन की तुलना में आज महिलाएँ काफी मुखर थीं.उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था. आज कुछ और महिलाएँ आईं थीं. जब रजिस्टर पर उपस्थित महिलाओं का नाम लिखा जाने लगा तो आज पहली बार आई महिलाओं ने भी अपना नाम लिखने को कहा. कुछ महिलाएँ जो नहीं आई थीं, उनका भी नाम लिखवाने लगीं.कि उन्हें भी रोजगार चाहिए. मैंने टोका, ‘ यह रोजगार देने के लिए नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि उपस्थिति दर्ज करने के लिए लिखा जा रहा है. पहले दिन आईं महिलाओं ने भी उन्हें समझाया.
अब समय था संवाद को आगे बढ़ाने का. जब महिलाओं से यह पूछा कि पहले दिन जो बात हुई थी, क्या उसे अपने घर में पति के साथ शेअर किया. ज्यादातर महिलाओं ने पति के साथ इस सदर्भ में बात करने की बात बताई. और उनके पतियों की प्रतिक्रिया भी सकारत्मक थी. लेकिन कुछ महिलाओं ने तल्खी से कहा कि पति से क्यों बताएँ? वह हमें कब कुछ बताते हैं..? जब हम काम करेंगे तो उनको अपने आप पता चल जाएगा.
तो बात फिर आगे वहीं से शुरु हुई कि क्या काम करना है? महिलाओं ने कहा कि हमें जो समझ में आता था, उसी दिन बता दिया था, अब आप ही कुछ कहिए. धनंजय कुमार ने तब गौ-पालन का प्रस्ताव रखा. धनंजय कुमार ने हमारे गाँव के लक्ष्य को हासिल करने के ख्याल से विशेष रणनीति के तहत ‘गौ-पालन’ के कार्य को महिलाओं के समक्ष रखा था, ताकि इन महिलाओं को कृषि कार्य से प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, जोड़ा जा सके. मैंने महसूस किया ज्यादातर महिलाओं का चेहरा बुझ गया. पूछने पर कुछ ने कहा कि ज़गह की समस्या है, तो कुछ ने कहा कि बंधन हो जाएगा. गाय पालना एक आदमी के वश की बात नहीं है, दिनभर उसी में लगे रहना होगा. गायों के चारा के लिए घास गढ़ना भी हमारे लिए ठीक नहीं है. इस पर मैने और स्पष्ट किया कि न तो ज़गह की समस्या आएगी और न ही किसी को घास गढ़ना होगा, और न ही किसी को किसी तरह का बंधन होगा. महिलाओं की उत्सुकता जागी, ‘यह कैसे संभव है? मैंने कहा, अगर आप सब महिलाएँ ग्रुप बना लीजिए, एक हो जाइए. इस पर एक महिला बोली, ‘अच्छा तो स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए कह रहे हैं...!’ मैंने कहा, नहीं, दूसरे की सहायता करने वाला ग्रुप. एक ऎसा ग्रुप जिसमें किसी एक की समस्या सिर्फ उसकी समस्या न रहे, बल्कि बाकी साथी भी उसकी समस्या को अपनी समस्या मानकर उसके समाधान में जुट जाएँ. मान लीजिए, आपका बीस साथियों का यह ग्रुप है, और इनमें से कोई एक साथी किसी समस्या से घिर जाए, तो उन्हें उस संकट के समय अकेला नहीं छोड़ देंगे, बल्कि बाकी उन्नीस साथी भी उनकी सहायता के लिए डट जाएँगी. महिलाओं को यह कुछ अजीब-सा लगा- हसुआ के बियाह में खुरपी के गीत जैसा. उनकी जिज्ञासा अबतक अनुत्तरित थी-गौ-पालन कैसे होगा? मैंने आगे रास्ता सुझाया-‘ समूह में गौ-पालन किया जाएगा. सबकी गाएँ एक गौशाले में रहेंगी,आपलोगों का यह समूह एक समिति का रूप ले लेगा. फिर एक कार्यकारिणी समिति चुनी जाएगी. समिति का सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन करा लिया जाएगा.आप सारे सदस्य जो व्यवस्था बनाएँगे, कार्यकारिणी समिति उस पूरी व्यवस्था को सँभालेगी. गायों की देखभाल के लिए दो लोग नियुक्त किए जाएँगे. अगर आप में से कोई काम करना चाहें तो वो कर सकती हैं, बदले में हर महीने वेतन मिलेगा. अन्यथा बाहर के लोगों को नियुक्त किया जाएगा. दूध, गोबर और गौमूत्र की बिक्री से जो आमदनी आएगी, वो समिति के बैंक खाते में जमा किया जाएगा, फिर सारे खर्चे काटकर जो रकम बचेगी, वह बराबर- बराबर सबके बैंक खाते में जमा करा दी जाएगी.जिस पर सिर्फ आपका अधिकार होगा.’ यह सब सुनने के बाद महिलाओं का सवाल आया कि गाएँ आएँगी कहाँ से? क्या गाय खरीदने के लिए सरकार पैसे देगी?’ मैंने कहा, सरकार भी सहायता करती है, लेकिन पहले आपलोग समूह बनाने और समूह में रहने का मन बना लीजिए, उसके बाद इस पर चर्चा करेंगे अगली मीटिंग में.         
 


महिलाओं के साथ पहला दिन

Dhananjay kumar

महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने के क्रम में हमारे गाँव के तहत धनंजय कुमार ने सबसे पहले ‘महिलाओं के साथ संवाद’ के स्तर पर काम करना शुरू किया. लोकल रिसोर्स पर्सन पिन्नु ने इसके लिए 20 के करीब महिलाओं को इकट्ठा किया था. महिलाएँ तय समय पर एक घर के एक कमरे में जमा हो चुकी थीं. महिलाओं की उम्र 25 से लेकर 60 साल तक की थी. महिलाओं में संवाद को लेकर उत्सुकता थी, हाँ बात करने में झिझक और शर्म ज़रूर महसूस कर रही थीं. धनंजय कुमार सबसे पहले इस सभा में आने की वजह जाननी चाही, तो महिलाओं ने बतलाया कि कुछ रोजगार के बारे में बात होगी, हमको कुछ काम मिल सकता है, इस वजह से यहाँ आए हैं. धनंजय ने और स्पष्ट किया, काम यानी नौकरी? महिलाओं ने हाँ में जवाब दिया. इस धनंजय ने कहा कि वह नौकरी देने वाली किसी कंपनी या भारत सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं, जो नौकरी देंगे, बल्कि वह बिना किसी नौकरी के रोजगार उपलब्ध कराने में उनकी मदद करने आए हैं.फिर पूछा कि अभी क्या काम करते हैं? सभी महिलाओं ने कहा कि अभी तो अपने घर-परिवार का ही काम करते हैं- खाना बनाना, पुरुषों-बच्चों के कपड़े धोना, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना..आदि. बातचीत के दौरान यह पता चला कि सभी महिलाएँ निम्न मध्य वर्ग से हैं. पहले सबके परिवार वाले किसान थे, मगर लगातार टूटते संयुक्त परिवार की वजह से खेत बँटते-कम होते चले गए. ये सारी महिलाएँ अभी एकल परिवार में रह रही हैं. बहरहाल, अब इतने खेत नहीं रहे कि खेती से गुजारा हो सके, इस वजह से इन महिलाओं के पति छोटा-मोटा कोई बिजनेस या छोटी-मोटी कोई प्रायवेट नौकरी करते हैं. बहरहाल जब धनंजय कुमार ने यह पूछा कि आपलोगों को काम क्यों चाहिए, तो महिलाओं ने कहा कि एक तो घर के काम करने के बाद काफी समय खाली बच जाता है, उसका कुछ इस्तेमाल करना चाहते हैं, दूसरे कुछ काम करेंगे तो कुछ कमाई होगी. क्या पति की कमाई घर-खर्च में कम पड़ती हैं?  इसपर महिलाओं ने घर-खर्च में कमी की बात तो नहीं स्वीकारीं, मगर यह ज़रूर स्वीकारा कि स्वयं का कमाया पैसा उनका होगा,जिसे वह अपनी मर्जी से जैसे चाहें,जहाँ चाहें खर्च कर सकती हैं. यह पूछने पर कि किस तरह का काम करना चाहती हैं? ज्यादातर महिलाओं ने कहा कि वैसा कोई भी काम, जिसे घर में रहकर किया जा सकता है. घर में रहकर ही क्यों, घर से बाहर काम मिले तो क्यों नहीं? महिलाओं का झिझक भरा जवाब था कि घर के काम को देखते हुए वह काम कर सकते हैं इसलिए. दरअसल, यह महिलाएँ काम तो करना चाहती हैं, मगर बिना घर-परिवार को डिस्टर्व किए.इसमें छुपा भय पति का भी था.यह पूछने पर कि क्या पति को पता है कि आपलोग काम के लिए यहाँ जमा हुए हैं? महिलाओं ने कहा- ‘नहीं. यहाँ से जाने के बाद ज़रूर बताएँगे.’ महिलाओं से जब यह जानने की कोशिश की कि कौन-कौन काम कर सकती हैं? महिलाओं ने स्टीरियो सा जवाब दिया,’ सिलाई-बुनाई-कढ़ाई का काम, अचार-पापड़ आदि बनाने का काम. धनंजय कुमार ने कहा कि ये तो महिलाओं द्वारा किया जानेवाला टिपिकल-ट्रैडिशनल काम है, कोई ऎसा काम सोचिए, जो अलग हो, जिसमें कमाई और आगे बढ़ने के ज्यादा स्कोप हों. इन्हीं बातों के साथ सभा सम्पन्न हुई, और तय हुआ कि सप्ताह में दो दिन मिला जाए...मंगलवार और शनिवार को. आज शनिवार था, इसलिए अगली मीटिंग मंगलवार को तय हुई. सभा-स्थल भी बदल दिया गया.महारानी स्थान के बाहर चौराहे पर.       

डेयरी से बदली जा सकती है गाँवों की तकदीर
धनंजय कुमार
गाँवों से श्रमशक्ति और प्रतिभा का पलायन आज भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। शहरों में बढ़ती भीड़ से शहर की सारी नागरिक सुविधापरक व्यवस्थाएँ चरमरा गई हैं. पीने का पानी उपलब्ध कराने और कचरे के निबटारे जैसी व्यवस्थाओं का संचालन भी सरकारों के लिए भारी सरदर्द बन गया है. शहर जो कभी सपनों को पूरा करने का केन्द्र हुआ करते थे,  पिछले कुछ दशकों में मुसीबत का केन्द्र बन गए हैं. महँगाई की वजह से घर में रहना मुश्किल है, तो भारी ट्रैफिक की वजह से सड़कों पर निकलना. सच कहा जाय तो हमारे शहर जेल में तब्दील हो गए हैं.
ऎसे में जरूरत है एक ऐसी अर्थव्यवस्था की जो गाँवों के युवाओं को गाँवों में ही रोजगार दे सके. गाँव की अर्थव्यवस्था सदियों से खेती और मवेशी आधारित रही है.  पिछले कुछ सालों में हमारी सरकारों ने इस ओर ध्यान ज़रूर दिया है, लेकिन उनकी दोषपूर्ण नीतियों, अगंभीर कोशिशों और नख से लेकर शिख तक व्याप्त अप्रतिम भ्रष्टाचार की वजह से अबतक कोई भी सकारत्मक परिणाम धरातल पर नहीं आ पाए हैं. सरकार की भारी सब्सिडी आधारित तमाम लाभकारी घोषणाओं-योजनाओं के बावजूद गाँवों से युवाओं का शहरों और सरकारी नौकरियों की ओर पलायन जारी है.
डेयरी एक ऐसा क्षेत्र है जिसके उत्थान से गाँवों की तस्वीर और तकदीर दोनों बदली जा सकती है। भारत सरकार ने 1970  से शुरू हुई दुग्ध क्रांति के बाद डेयरी को ज़रूर उद्योग के तौर पर देखना शुरू किया, लेकिन उसकी दृष्टि, नीतियाँ और कोशिशें दूध और दूध आधारित व्यवसाय तक ही सीमित रहीं. यही वजह है कि आज भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश में होने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेयरी उत्पादों के योगदान की अगुआई करने के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में डेयरी का जितना योगदान होना चाहिए था, नहीं है.
दुग्ध उत्पादों के वृहत बाज़ार को देखते हुए भारत का डेयरी उद्योग दूध का अधिक से अधिक दूध उत्पादन चाहता है. लिहाजा पशुपालन के क्षेत्र में देशी गायों की तुलना में ज्यादा दूध देनेवाली विदेशी नस्ल की गायों को मह्त्व दिया जा रहा है. विदेशी नस्ल की ये गाएँ दूध देने में ज़रूर बाज़ी मार लेती हैं, मगर दूध की गुणवता में पिछड़ जाती हैं. गोबर और मूत्र के मामले में विदेशी नस्ल की ये गाएँ अलाभकारी होती हैं. इनके गोबर बदबूदार होते हैं, घर आँगन को इस गोबर से लीपकर शुद्ध नहीं किया जा सकता. मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के मामले में भी विदेशी नस्ल की गायों के गोबर देशी गायों के गोबर की तुलना में कमतर हैं. इन सब के अलावा विदेशी नस्ल की इन गायों का सर्वाधिक निराशाजनक पहलू यह है कि इनके नर बच्चे न तो किसानों के काम आने लायक होते हैं और न ही बोझ ढोने के लिए बैलगाड़ी में जोते जाने लायक. इसलिए इन बछड़ों का बाज़ार मूल्य देशी गायों के बछड़ों की तुलना में नगण्य होता है. ऎसे में विदेशी गायों के ये बछड़े माँस के लिए बूचड़खानों में कटने को अभिशप्त होते हैं. वास्तव में यह कितना अमानवीय है कि जिनके दूध से हम अपनी सेहत और अर्थव्यवस्था सुधार रहे हैं, उन्हीं के बच्चों को क़त्लखानों में निर्ममता से काट रहे हैं!
जबकि देशी गायों से दूध भले ही कुछ किलो कम मिलता हो, लेकिन उसके बछड़ों से लेकर गोबर और मूत्र तक हमारे लिए उपयोगी और कीमती हैं. इनके गोबर और मूत्र का खाद व कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल कर जैविक खेती के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में भी कायाकल्प किया जा सकता है. लेकिन विडम्बना है कि गोबर और मूत्र से बनने वाली खाद और कीटनाशक की तरफ सरकार का ध्यान और प्रयास महज खानापूर्ति भर है. नहीं तो गायों से सिर्फ अधिक से अधिक दूध प्राप्त करने की दिशा में प्रयास नहीं किए जाते. ज्यादा दूध के फेर में जर्सी गायों को डेयरी के विकास के नाम पर जिस तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है, वह चिंताजनक अदूरदर्शी सोच और नीतियों का परिणाम है. यह ठीक वैसा ही है, जैसा सूरज का इस्तेमाल हम सदियों सिर्फ दिन के उजाले के तौर पर करते रहे. आज सौर-ऊर्जा को लेकर जो वैश्विक दृष्टि बनी है, वह कितनी चमत्कारिक है, यह अब अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. ठीक उसी तरह, अगर हम दूध के अलावा गोबर और मूत्र के इस्तेमाल को लेकर अपनी दृष्टि विकसित कर लें, तो जैविक माध्यम से उत्तम खेती कर न सिर्फ अर्थव्यवस्था को शिखर तक सुधार सकते हैं बल्कि भूख और भोजन में मिले केमिकल्स व पेस्टिसाइड से होनेवाली बीमारियों से भी हम मुक्ति पा सकते हैं.