इंडिया टुडे के नए अंक में पृष्ठ 40-41 पर "बैंक लोन मंजूर करो या मरो" शीर्षक से एक रिपोर्ट छापी गई है , जिसके रिपोर्ट-लेखक ने बयान किया है कि किस तरह बदमाशों के भय से दहशत में है बैकों के प्रबंधक. प्रभावशाली बिचौलिए लोन पास करने के लिए किस तरह धमकाते हैं और नकली दस्तावेजों के आधार पर लोन ज़बरन पास करवा लेते हैं. दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सुशीलकुमार मोदी, जो कि प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, का कथन है 'सरकारी दफ्तर के मुक़ाबले बैंकों में ज्यादा भ्रष्टाचार है.'
आम तौर पर नेताओं को गलतबयानी करनेवाला माना जाता है,लेकिन मेरा स्वयं का अनुभव भी मोदी जी के बयान से मिलता है. मैंने भी सोचा था किसान क्रेडिट कार्ड बनवा लिया जाय, ताकि कभी-कभार की पैसों की आवश्यक ज़रूरत को पूरा करने में मदद मिले, हालाँकि मेरे पिताजी खिलाफ थे. उनका कहना था कि कृषि कार्य अनिश्चितताओं से भरा है, लोन तो चुकाना ही होगा, फसल हो अथवा न हो, फिर मेरी इच्छा थी कि सुविधा का लाभ लेने में बुराई नहीं है. मगर मुझे फॉर्म भरते ही ज़रूरी जानकारी प्राप्त हो गई कि के सी सी बनवाने के लिए 3 से 4 हज़ार रुपए खर्च करने होंगे. मैंने कहा, मैं बैक द्वारा माँगे जानेवाले सारे दस्तावेज दूँगा, तब जवाब मिला कि लोन ब्रांच मैनेजर पास करेगा, बैंक नहीं, इसलिए रिश्वत के बिना काम मुश्किल है.यह अद्भुत जानकारी मुझे ब्लॉक में ही मुझे मिल गई थी, जब आवेदन वहाँ जमा करने गया. कृषि ऋण के लिए ब्लॉक से ही कागजात बैंक को फॉरवर्ड किए जाते हैं. मेरे पास यकीन करने के अलावा कोई चारा नहीं था,क्योंकि गाँववालों से मुझको पहले ही मुझे यह अनुभव मिल चुका था कि बैक में सेविंग अकाउंट खोलने के लिए भी रिश्वत ली जाती है. चाहता तो मैं अधिकारी से भिड़ सकता था, लेकिन उचित नहीं समझा. एक तो समयाभाव, दूसरे कम से कम उलझने की मेरी नीति.
इसी रिपोर्ट में बैंक के एक अधिकारी और पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव कुमार अरविंद का भी बयान है कि सर्कल अधिकारी किसान के एफिडेविट के आधार पर कब्ज़े का प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं. फिर बैंक बिना सत्यापित एफिडेविट पर लोन जारी करने को मजबूर है. जबकि हकीकत यह है कि एल पी सी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट सिर्फ किसान के एफिडेविट के आधार पर नहीं बनता. किसान द्वारा लिखे गए खेत के प्लॉट नं. को पहले कर्मचारी अपने रजिस्टर से मिलाता है, 'सही है' की टिप्पणी लिखता है, उसके बाद सी आई यानी सर्कल इंस्पेक्टर उसपर दस्तखत करता है, उसके बाद सी ओ साहब दस्तखत करते हैं और एलपीसी किसान तक पहुँचता है.
यह तो नियम की बात हुई, लेकिन वास्तव में किसान को हर ज़गह चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है. एफिडेविट तो किसान को अतिरिक्त दंड है, इसे प्रदेश राजस्व विभाग और वकील का हिस्सा मानिए.
बहरहाल यह है कृषि ऋण की वस्तुस्थिति. अब इतने झंझट वाले काम में कोई मेरे जैसा ईमानदार किसान अपनी ऊर्जा लगाएगा यह तो सोचना भी बेमानी है. ऎसे में जो ऋण पास कराएगा उसकी मंशा कितनी सही होगी, समझा जा सकता है. इसमें सरकार की नीतियाँ भी ज़िम्मेदार है. सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि आज ज्यादातर वैसे लोग किसानी का कार्य कर रहे हैं, जो पट्टे पर खेत लेकर खेती करते हैं, फिर वह एलपीसी कैसे बनवाएँगे..?
ऎसे में ज़रूरत है सही नीति और उसके सही-सही क्रियान्वयन की, ताकि किसानों को भी लाभ मिले, बैंकों को भी और सरकार को भी.
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| Photo-Manoj Kumar |

Ye sach hai.. Aur Sarkar ko kuchh aise niti banani chahie ki jisse Kisano ko Sarkari Subidhayen mil sake... Thank q.
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