Tuesday, 19 February 2013

नालन्दा के बिन्द गाँव में शुरू हुआ “देवनन्दन पब्लिक स्कूल”

शिक्षा हमारी मूलभूत ज़रूरत है. हम भौतिक जीवन जीना चाहें या आध्यात्मिक जीवन शिक्षा हर राह पर हमारी चेतना को संवारती है. इसीलिए हमारे गाँवके तहत हमने सबसे पहले शिक्षा पर ही काम करना शुरू किया. इसकी संकल्पना करते वक़्त हमारे पास पहला सवाल था - कैसी शिक्षा? रोजगारोन्मुख बनाने वाली शिक्षा या समाजोन्मुखी बनाने वाली शिक्षा. आम ग्रामीण जनमानस चाहती है, वैसी शिक्षा या भविष्य को सचमुच संवारे वैसी शिक्षा..? हमारे बच्चों को अच्छी नौकरी करने लायक बनाए, वैसी शिक्षा या दुनिया में कहीं भी किसी भी विषम परिस्थिति में मानवीय बने रहने लायक बनाए, वैसी शिक्षा..? तो हमने तय किया कि शिक्षा वो जो गणित के जोड़-घटाव के साथ-साथ जीवन के जोड़-घटाव में भी हमारे बच्चों को अव्वल बनाए !
फिर हमारे सामने प्रश्न उभरा-शिक्षा का माध्यम क्या हो? यानी शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा यानी हिन्दी हो या पूरी दुनिया की सम्पर्क भाषा बन चुकी अंग्रेजी भाषा...? बहुत विचार कर हमने अंग्रेजी को ही माध्यम के तौर पर चुनना श्रेयस्कर समझा. क्योंकि आम जनमानस में अंग्रेजी को लेकर बड़ा भय व्याप्त है. किसी तरह दो-चार पंक्ति टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति भी पढ़ा-लिखा होने का रौब गाँठ लेता है. हमने तय किया आम जनमानस के भय और अंग्रेजी बोलनेवाले के रौब को समाप्त करने की आवश्यकता है.
गाँव तो छोड़िए मुम्बई-दिल्ली तक में हमने देखा है कि अँग्रेजी के नाम पर टुच्चा-सा स्कूल भी किस तरह हम पर और हमारे बच्चों पर आर्थिक और मानसिक ज्यादतियाँ करता है. हमारे स्वाभिमान पर तो आठों पहर नकेल कसे रहता है. हम हमेशा अपने बच्चों के स्कूल से अपमानित किए जाने और निष्कासित कर दिए जाने से आक्रांत रहते हैं. इसी भय के तहत हम भारी से भारी डोनेशन देने से लेकर स्कूल की ऊटपटांग माँगों-फरमाईशों के सामने सजदा किए रहते हैं. ऎसा इसलिए कि हम यह आत्मसात किए बैठे हैं कि ये अंग्रेजी स्कूल ही हमारे बच्चों के भविष्य का निर्माता हैं. यह सच है कि विद्यालय हमारे बच्चों के भविष्य-निर्माण में महती भूमिका निभाते हैं...लेकिन अँग्रेजी के नाम पर चलाए जा रहे ये संस्थान विद्यालय कहलाने योग्य भी हैं...? विद्यालय का पहला कार्य है शिक्षार्थियों का चरित्र-निर्माण करना. उनमें मनुष्य होने के गुण भरना. भारी डोनेशन की नींव पर खड़े ये स्कूल क्या चरित्र-निर्माण की बात कर सकने योग्य भी हैं...?
अतः यह चिंता सर्वथा प्रासंगिक है कि शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को हम क्या दे रहे हैं...? जबरिया डोनेशन के बल पर ली जा रही शिक्षा क्या कल्याणकारी होगी ?
हमारे गाँव के तहत हमने वैसी शिक्षा को मूर्तता प्रदान करने का स्वप्न देखा है, जो शिक्षार्थी के साथ-साथ पूरी सृष्टि के लिए कल्याणकारी हो. 6 फरवरी 2013 को नालन्दा जिले के बड़े और सुन्दर से बिन्द गाँव में देवनन्दन पब्लिक स्कूल की शुरूआत कर हमने इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया है. इसकी ओपनिंग पर हमने आम ग्रामीणों के साथ-साथ बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार जी को भी आमंत्रित किया, ताकि हमारी सरकार तक भी हमारा विचार पहुंचे.
देवनन्दन पब्लिक स्कूल में इस वर्ष नर्सरी से पहले क्लास तक की पढ़ाई की व्यवस्था की गई है. आगे ज़रूरत के अनुसार क्लास बढ़ती चली जाएगी. बस ज़रूरत है आपकी शुभकामनाओं की.

‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ बिन्द, नालन्दा
हमारे गाँव के तहत शुरू किए गए ‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ के शुभारंभ के अवसर पर बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ ‘हमारे गाँव’ के स्वप्न द्रष्टा व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार, शिक्षिका और विद्यार्थी. 



                        
      

Saturday, 16 February 2013


"हमारे गाँव" के तहत शुरू किए गए विभिन्न कार्यक्रमों की झलक चित्रों के माध्यम से.                      .(फोटो-मनोज कुमार)



प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार को "हमारे गाँव" के तहत शुरू की गई खेती के बारे में चर्चा करते धनंजय कुमार 


देवनन्दन पब्लिक स्कूल के शुभारंभ के अवसर पर (बाएँ से) ताजनीपुर पंचायत के मुखिया दुलारचन्द रजक,हमारे गाँव के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार, साबरी के निदेशक संजीव कुमार, लोदीपुर पंचायत के मुखिया धर्मेन्द्र ठाकुर और प्रगतिशील किसान लल्लू जी

देवनन्दन पब्लिक स्कूल,बिन्द,नालन्दा

उच्च विद्यालय बिन्द के प्रभारी प्राचार्य भगीरथ प्रसाद और धनंजय कुमार

राजस्व कर्मचारी सूर्यकांत चतुर्वेदी के साथ धनंजय कुमार.








बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में साबरी के निदेशक संजीव कुमार


बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में साबरी के निदेशक संजीव कुमार

बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में देवनन्दन पब्लिक स्कूल के शिक्षक  आरती, सिम्पी तथा छात्राएँ सुहाना व अंकिता.

Tuesday, 25 December 2012

फूलों की खेती की शुरुआत कर लिखी जा रही बदलाव की नई इबारत

फोटो- मनोज कुमार 

बिहार के नालंदा ज़िले के बिन्द गाँव में पहली बार पारम्परिक खेती से अलग हटकर नगदी फसल के तौर पर फूल की खेती शुरू की गई है. परिवर्तन की यह पहल हमारे गाँव के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार ने की है.धनंजय कुमार ने यह परिवर्तनकारी शुरुआत अपने ही खेत से की है. अभी उन्होने एक बीघा खेत में गेंदे की विकसित किस्म पूसा नारंगी और पूसा वासंती लगाई है. फूल नवंबर महीने से ही खिलने शुरू हो गए हैं. सरमेरा-बिहटा फोरलेन इस खेत से सटकर गुजर रही है, इसलिए वहाँ से गुजरने वाले अनगिनत ग्रामीणों को आकर्षित कर रहे हैं. बिन्द सहित पास-पड़ोस के अनेक गाँवों के किसान फूल की इस खेती को लेकर उत्सुक और जिज्ञासु हैं. लगभग रोज़ ही कोई न कोई किसान धनंजय कुमार से मिलकर फूल की खेती के बारे में पूछताछ करते हैं. धनंजय कुमार उसके उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक से उन किसानों को अवगत कराते हैं. अबतक मिलने वाले अधिकांश किसानों ने लाभ को देखते हुए फूल की खेती करने का मन बनाया है. धनंजय कुमार मिलनेवाले किसानों को न सिर्फ फूलों की खेती को लेकर जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं, बल्कि वह पपीता, केला और मेंथा की खेती के लिए भी तैयार कर रहे हैं. धनंजय कुमार कहते हैं कि नालन्दा ज़िले की मिट्टी खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है. उर्वरा शक्ति से भरपूर यह मिट्टी इन नगदी फसलों के लिए भी मुफीद है. मगर जानकारी के अभाव में यहाँ के किसान अभी भी पारम्परिक खेती ही कर रहे हैं. पूर्वजों के समय से धान-गेहूँ यहाँ के किसानों की मूल फसल है. धान-गेहूँ में लाभ का मार्जिन बेहद कम है. अच्छी उपज होने पर भी चार से पाँच हज़ार रुपए से अधिक का लाभ नहीं होता. इस वजह से यहाँ के किसान लगातार खेती का कार्य छोड़ शहर की ओर नौकरी या किसी अन्य रोज़गार की तलाश में शहर भाग रहे हैं. धनंजय कुमार पिछले एक साल से इन किसानों के बीच काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि किसान खेती को लेकर बेहद निराश और उदासीन हैं. ज्यादातर किसान स्वयं खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह बटाईदारों या पट्टा पर खेत लेनेवाले ईंट भट्ठा मालिकों को अपने खेत दे देते हैं. बटाईदार छोटे किसान या मज़दूर हैं. विडम्बना यह है कि वे लोग भी खेती से बेजार हो चुके हैं. पारम्परिक खेती में मेहनत की तुलना में कम लाभ और मजदूरों के अभाव के चलते दिन ब दिन महँगी होती खेती की वजह से किसानों के खेती से दूर होते जाने की मुख्य वजह है. लेकिन धनंजय कुमार का मुम्बई से आकर खेती के लिए काम करना उन किसानों के लिए संजीवनी का काम किया है. धनंजय पिछले दो दशक से मुम्बई में पहले पत्रकारिता फिर टेलीविजन और सिनेमा से जुड़े रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में जहाँ वह जनसत्ता और दोपहर का सामना से जुड़े रहे, वहीं टेलीविजन और सिनेमा में भी वह पहले डेली सोप शांति से लेकर शगुन और एक टुकड़ा चाँद का जैसे दसियों सीरियल लिख तथा हमार घरवाली जैसी सुपरहिट फिल्म निर्देशित कर लेखक व निर्देशक के तौर पर सफल पारी खेल चुके हैं. इसके अलावा वह थिएटर ऑफ रेलेवेंसके सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज के साथ वह सालों से थिएटर के माध्यम से बदलाव में अपनी महत्वपूर्ण भागदारी देते रहे हैं. इसके बाद 2011 में धनंजय कुमार ने हमारे गाँवका कॉंसेप्ट गढ़ा, जिसके तहत वह गाँव को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने की लक्ष्य-साधना में जुटे हैं. धनंजय कुमार इस बात से बेहद चिंतित है कि विकास की अंधी दौड़ में हमारे गाँव बदरूप शहर में परिवर्तित होते जा रहे हैं. वह कहते हैं, हमारे गाँव नष्ट होते जा रहे हैं. और हमारे गावों के नष्ट होने का मतलब है, हम भारतीयों की पहचान का नष्ट होना. हमें अपनी पहचान को बचाना है तो हमारे गाँव को बचाना होगा.
धनंजय कुमार इसी लक्ष्य को लेकर अपने खेतों में उतरे हैं. अपने गाँव बिन्द को उन्होंने प्रयोगभूमि के तौर पर चुना है, जहाँ वह खेती के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक-राजनीतिक सुधार और सांस्कृतिक चेतना पर भी काम कर रहे हैं. बिन्द में अभी वह डेमोंस्ट्रेशन सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो आनेवाले वर्षों में देश में अनुभवपरक सार्थक बदलाव का केंद्र बनेगा. 

Sunday, 23 December 2012

Dreams are blooming...in village Bind.


Horticulture- to empower the farmers By Dhananjay Kumar.


photo by Manoj Kumar


photo by Manoj Kumar



Photo-Dhananjay Kumar 



Friday, 14 December 2012

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA !

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA
video by ms Rupam Kumari
uploaded by Lalan Kumar Kanj

Tuesday, 11 December 2012

मनरेगा और एफडीआई किसानों के लिए ताबूत में आखिरी कील हैं

फोटो - मनोज कुमार

 धनंजय कुमार
किसानों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है. केन्द्र व राज्य सरकारें भले ही किसानों की बेहतर स्थिति के लिए अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटने और किसानों के हित के लिए सतत कल्याणकारी नीतियाँ बनाने के दावे कर रही हो, मगर सच्चाई बिल्कुल उलट है. अरबों-खरबों की सब्सिडी किसानों के नाम पर बँदरबाँट की भेंट चढ़ रही है और रोज़ किसान अपने खेत छोड़कर भाग रहे हैं या इंडस्ट्री के नाम पर सरकारों व एस्टेट एजेंटों द्वारा जबरन ख्देड़े जा रहे हैं. मैं स्वयं किसान परिवार से हूँ. मेरा लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सब कृषि की वजह से ही हुआ, मगर आज से 40 साल पहले ही मेरे पिता ने स्वप्न देख लिया था या कहिए कसम ले ली थी कि बेटा किसान नहीं बनेगा. इसी तरह मेरे पिताजी के अन्य मित्रों के बेटे भी अपने पिताओं की चाहत (मजबूरी कहना उपयुक्त होगा) के चलते आज कलेक्टर से लेकर क्लर्क तक बन भारत अथवा किसी राज्य सरकार की चाकरी कर रहे हैं, मगर कोई किसान नहीं बना. सरकार के वैज्ञानिकों के शोध व रिकॉर्ड्स आज भी बताते हैं कि बिहार के नालंदा ज़िले के खेतों की मिट्टी कृषि कार्य के लिए सर्वोत्तम है, बावजूद इसके नालंदा के लगभग युवा खेती छोड़ कोई छोटी-मोटी नौकरी भी करने को लालायित हैं. हाँ सरकारें अपने कृषि विभाग के आँकड़ों के आधार पर ज़रूर दावे कर खुश हो रही है कि कृषि के क्षेत्र में प्रदेश व देश लगातार तरक्की कर रहा है. यही रटंत आँकड़ा नालंदा ज़िले के ही बिन्द प्रखण्ड के दफ्तर में एक दिन चर्चा के केन्द्र में उछला. कृषि विभाग के एक छोटे से कर्मचारी ने गर्व से आँकड़ा प्रकट किया कि हमने कितने हेक्टेयर खेतों में फलाँ-फलाँ फसलें लगवाईं. हमारे ज़िला नालंदा ने आलू से लेकर धान उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाए. यह सब सरकार की किसान समर्थक नीतियों और हमारे बेहतर क्रियान्वयन का नतीजा है. इस पर मैंने पूछा कि अगर कृषि के क्षेत्र में इतना उत्साहजनक विकास हुआ है तो यह बताइए कि क्या आपके विभाग के छोटे कर्मचारी से लेकर किसी बड़े अफसर ने इस्तीफा देकर खेती से जुड़ने का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया है? इसपर इस कर्मचारी को बचाव में कोई जवाब नहीं सूझा, वह अ...ब... करने लगा, जबकि बाकी श्रोता हँस पड़े. तो यह है कृषि और किसानों की वस्तुस्थिति, वह भी उस प्रदेश में, जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री सालों से देश की हर थाली में अपने प्रदेश के खेतों में उपजे अन्न, फल अथवा सब्ज़ियों से बना एक व्यंजन परोसना चाहते हैं. बहरहाल यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि किसानों के नाम पर हर सरकारी नीति और योजना सिर्फ लूट है, और लूट के सिवा कुछ नहीं है. सच यह है कि किसानों की दशा लगातार बिगड़ रही है.
क्यों बिगड़ रहे हैं हालात
गाँधी जी ने आज़ादी का वास्तविक सुख देश के किसानों के घरों में देखना चाहा था, इसीलिए भारत में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई उन्होंने चम्पारण के नील की खेती करनेवाले किसानों के साथ शुरू की थी, मगर कालांतर में किसान लगातार हाशिए पर धकेले जाते चले गए. हरित क्रांति को भले ही किसानों की भलाई के लिए प्रचारित किया गया, मगर वह भी देश को भुखमरी से बचाने के क्रम में उठाया गया किसान विरोधी कदम था. इसका नतीजा आज पंजाब के किसान और खेत भुगत रहे हैं. किसान कैसर और कर्ज से ग्रस्त हैं तो खेत लगातार घटते वाटर लेबल और उर्वरा क्षमता से बांझपन के कगार पर हैं.
किसानों की बदहाल हालत के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार फैक्टर है सरकारों द्वारा किसानों और उनके खेतों को कम करके आँका जाना. आज़ादी से पहले जिन खेतों पर देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी आश्रित थी, उसको देश की आर्थिक व्यवस्था का आधार मानने के बजाय देश के कर्णधार नेताओं और नौकरशाहों ने इंडस्ट्रीयलायजेशन को मूल आधार बनाया. नतीजा रहा बाज़ार पर किसानों का प्रभुत्व होने के बजाय उद्योगपतियों और व्यापारियों का दबदबा बना. और बनता गया. किसान बाज़ार से दूर मिट्टी तक सीमित कर दिए गए और अंततः मिट्टी में ही मिल गए.
मनरेगा और एफडीआई ताबूत में आखिरी कील हैं
मनरेगा को देश के महान आधुनिक अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं, मगर दरहकीकत यह है कि बाज़ार की मार से अधमरे किसानों के लिए यह ज़हर का काम कर रहा है. मनरेगा के पीछे श्रीमान सिंह और उनके वृदों का सुमधुर गीत यह है कि मनरेगा गाँव से मजदूरों के पलायन को रोकने में कारगर होगा, जबकि सच्चाई यह प्रकट हो रही है मनरेगा के तहत साल के सौ दिन प्रतिदिन लगभग डेढ़ सौ रुपए पानेवाले मजदूर किसानों की पहुँच से बाहर हो गए हैं. पलायन की वजह से मजदूरों की
कमी झेल रहे किसानों पर मजदूरों का महँगा हो जाना सर मुड़ाते ओले पड़ने जैसा है. इसी तरह मनरेगा के बाद एफडीआई किसानों पर और भी भारी पड़ने वाली है. श्रीमान सिंह का तर्क है कि इससे बिचौलियों का सफाया हो जाएगा और किसान को अपनी उपज का अधिकतम मूल्य मिलेगा. बेचारे किसान जो छोटे व्यापारियों से पार नहीं पा रहे थे अब वॉल-मार्ट जैसी मल्टीनेशनल कम्पनी से स्वतः निबट लेंगे, यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सोच नहीं तो और क्या है! अगर यह मूर्खतापूर्ण नहीं है तो फिर देश को पुनः गुलामी की ओर धकेलने का अद्भुत प्रयास ज़रूर है. हे गाँधी!        

Sunday, 16 September 2012

स्लम बनते गाँव



विकास और प्रगति के नाम पर गाँव को शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल करा दिया गया है और गाँव शहरों के चमकते स्वरूप पर नासूर की तरह पसरे स्लम का रूप लेते जा रहे हैं. तंग गलियाँ, छोटे-छोटे बंद कमरों वाले घर, खुली ज़गहों पर लगातार अतिक्रमण, अपने परिवार तक केन्द्रित सोच, अधिक से अधिक पैसे कमाने की भाग-दौड़, रोटी-रोजगार के भविष्य की चिंता आदि शहरी विसंगतियाँ अब गाँव के चरित्र में भी घुल गई हैं. लेकिन जिस तरह से हमारे नगरों-महानगरों की मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में यह और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए सिरे से गंभीरता से सोचें.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता गया. शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति का, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना तथा हमारा समाज चौतरफा पतन की ओर चल पड़ा . 
गाँव तेजी से अपना सौंदर्य खोता जा रहा है. जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों, तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़ और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे, अब ज्यादा अमीर बनने की लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
महात्मा गाँधी ने कहा था कि ग्रामोद्योग का नाश हो गया तो भारत के गाँवों का सर्वनाश ही समझिए. उनका यह अंदेशा आज की कड़वी सच्चाई है. जो गाँव कभी सह-अस्तित्व पर आधारित अपने कुटीर और घरेलू काम-धंधों की वजह से आत्मनिर्भर हुआ करते थे, आज हर बात के लिए तेजी से पराश्रित होते जा रहे हैं. बढ़ई, चर्मकार, कुम्हार, लोहार, नाई, धोबी, जुलाहा आदि जाति के लोग अपनी मेहनत और हुनर से ग्रामीणों की ज़रूरत का सामान बनाते थे. ग्रामीणों को कभी भी शहरों या विदेशों का मुँह ताकना नहीं पड़ता था. लेकिन आज यह सारा कुछ ध्वस्त हो चुका है. साग-सब्ज़ी तक के लिए शहरों की तरफ भागना पड़ता है. हुनरमंद पारम्परिक जातियों की जगह अब व्यापारियों ने ले ली है. जो काम पहले घर-आँगन या घर के बाहर चौक-चौराहों पर बिना कोई खर्च हो जाया करते थे, उसके लिए अब बाज़ार में अच्छा-खासा किराया आदि चुकाना पड़ता है. पहले जो खेती और माल ढुलाई का काम बैलों से किया जाता है, उसकी जगह ट्रक्टरों ने ली है. गोबर और घूरे की खाद की जगह रासायनिक खादों का प्रयोग होने लगा. ऎसे में जाहिर है कि लागत मूल्य बढ़ेगा. फिर हमारी विपणन व्यवस्था में भी परजीवियों का खर्चीला प्रवेश हुआ है. पहले हाट-बाज़ार में किसान-उपभोक्ता सीधे मिलते थे. लेकिन बदली हुई व्यवस्था में किसान-उपभोक्ता का मिलना ही समाप्त हो गया. बिचौलियों की एक-दो नहीं अनगिनत कड़ियाँ खेत से बाज़ार के बीच घुस आई हैं. नतीजा है कि जीवन जीने के लिए बेहद अवश्यक वस्तुओं की कीमत भी तेज गति से बढ़ती जा रही है. पिछले दिनों औद्योगिक एजेंसी एसोचैम ने खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से मध्य वर्ग का जीना हुआ मुहाल के संदर्भ में जो सर्वे आधारित रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उससे जाहिर होता है कि किसान खूब मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि ट्रैक्टर और खाद आदि बनाने वाली कंपनियाँ और बिचौलिए मलाई मार रहे हैं. बेचारे किसानों के हाथ तो खुरचन ही आ रही है.