Thursday, 13 February 2014

हमारे गाँव को सही शिक्षा की ज़रूरत

हमारे गाँव और शिक्षा
शिक्षा मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है. बिना शिक्षा के न तो सम्मानपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है और न ही जीवन का वास्तविक-आध्यात्मिक मूल्य ही समझा जा सकता है.  हमारे पूर्वज शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षा देनेवाले आचार्यों और गुरुओं को भगवान के तुल्य माना. गुरू की तुलना त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की है. यानी गुरू ब्रह्मा की तरह जन्मदाता हैं, विष्णु की तरह पालनकर्त्ता हैं और  महेश की तरह शिष्य के मार्ग में आनेवाली बाधाओं के संहारक हैं. इस तरह गुरू साक्षात् परमब्रह्म हैं यानी गुरू ज्ञानमय परमात्मा हैं.
आरंभ में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे. जहाँ गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी गुरू-शिष्य परम्परा के तहत शिक्षा ग्रहण किया करते थे. इसके लिए विद्यार्थियों को घर का त्यागकर गुरू के साथ उनके आश्रमों में रहना पड़ता था. गुरुकुल का खर्च भिक्षाटन और गाँवों के सहयोग से चलता था. हमारे गाँवों ने यही परम्परा उच्च शिक्षा में भी कायम रखी. इतिहासकार बताते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए भारत वर्ष के बाहर भी विख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का खर्च आसपास के दो सौ गाँवों की आय से चलता था. विद्यार्थियों को शिक्षा, आवास, भोजन आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं. यह जानकर मन आत्मगौरव से भर जाता है कि उस समय हमारे गाँव इतने सबल और आत्मनिर्भर थे!
शिक्षा की हमारी इस महान परम्परा को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. और तबसे हम शिक्षा में पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गए, क्योंकि उसके बाद हम लगातार गुलाम ही रहे. मुस्लिमों ने विश्वविद्यालय नष्ट किए और अंग्रेजी हुकूमत ने आधुनिक शिक्षा देने  के नाम पर हमारे गाँव में अबतक चल रहे गुरूकुलों को मृतप्राय बना दिया.         
स्वतंत्रता के बाद भी हमारे गाँव में शिक्षा की स्थिति सुधरी नहीं, बल्कि अब तो दिनोंदिन और भी दयनीय होती जा रही है. हालाँकि हमारी सरकार ने शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार में शामिल कर 6 साल से 14 साल तक के बच्चों की शिक्षा को आवश्यक कर दिया है, ताकि सभी बच्चे अनिवार्य तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें और ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस होकर भारत का प्रबुध्द नागरिक बन सकें. यह अधिनियम गाँव के बच्चों को शिक्षा देने का की दिशा में बेहतर सुधार कर सकता है. मगर अभीतक सरकार विर्द्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने की जगह वोटबैंक तैयार करने की संभावनाओं पर काम कर रही दिखती है. जीवन-मूल्य परक शिक्षा की क्या बात करें, गाँव के इन स्कूलों में जीवन यापन के लिए रोजगार पाने योग्य शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है. हालाँकि गाँव के बच्चों को शिक्षा देने के लिए सरकार ने विद्यालयों की संख्या तो बढ़ाई है. 2012 एक सर्वे के अनुसार, ग्रामीण इलाकों के 6-14 साल के 96.5% बच्चों को स्कूल से जोड़ा जा चुका है. मगर यह डेटा सिर्फ हमारे नेताओं और शिक्षा अधिकारियों के खुश होने के लिए अच्छा है. वस्तुस्थित यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन स्कूलों के रजिस्टरों में जितने विद्यार्थियों की संख्या दर्ज है, उनका संबंध स्कूलों से मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल लेने भर से है, पढ़ाई से नहीं. गुरू भी अब ज्ञानमय परमात्मा नहीं, अपना जीवन यापन करने के लिए सरकारी नौकरी करनेवाले शिक्षक बन गए हैं. अफसोस तो यह है कि हमारे गाँव के स्कूलों में ऎसे शिक्षकों की भी भारी कमी है.
दरअसल हुआ यह कि सारे बच्चों को शिक्षा देने की कवायद में विद्यालय तो बनते चले गए, मगर प्रशिक्षित शिक्षकों को उसी अनुपात में तैयार करने की दिशा में गुणात्मक कार्य नहीं किया गया. और पहले से विभिन्न स्कूलों में पदस्थापित प्रशिक्षित शिक्षकों को ही नए स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया. इस तरह सभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो गई. इसकी भरपाई राज्य सरकारों ने कॉंन्ट्रैक्ट बेसिस पर अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर करने की नीति बनाई. मगर, यह नीति भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली और अयोग्य शिक्षकों की भर्त्ती करनेवाली साबित हुई है. प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव और वास्तविक वेतन दे पाने में असमर्थ सरकारें शिक्षकों को तय मापदंडों पर परखकर नियुक्त करने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट बेसिस और कम वेतन पर शिक्षकों को नियुक्त कर रही है. इस वजह से ये अप्रशिक्षित शिक्षक (अनट्रेंड टीचर) बच्चों को सही तरह से पढ़ाने में अक्षम तो हैं ही, कम वेतन पाने से असंतुष्ट भी. फिर मध्याहण भोजन, पोशाक और साइकिल वितरण की जिम्मेदारी भी सरकार ने इनपर लाद दी गई है. नतीजा है, शिक्षा के नाम पर सरकारें ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कामयाबी पर डेटा द्वारा तो अपनी पीठ थपथपा ले रही है, मगर शिक्षा और उसकी गुणवत्ता बिल्कुल ही चौपट हो गई है. स्थिति यह है कि दसवीं पास विद्यार्थी को भी किताब तक पढ़ना नहीं आता. ऎसी शिक्षा किस काम की?
शिक्षा की ऎसी दुर्गति के लिए सरकार की राजनीति से प्रेरित शिक्षानीति सर्वाधिक जिम्मेदार है. देश के 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के हर बच्चे को स्कूल से जोड़ने की कवायद में सरकार ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है. शिक्षा मद की राशि का एक बड़ा भाग मध्याह्ण भोजन, किताबें, पोशाक और साइकिल आदि बाँटने में खर्च कर दिया जा रहा है. शिक्षा के लिए ज़रूरी योग्य शिक्षक और शिक्षण समय उपेक्षित रह जाता है.
यह सच है कि गाँव में स्कूलों से दूर सिर्फ उनके ही बच्चे हैं, जो गरीब हैं और जिनको अपने बच्चे को स्कूल भेजने से ज्यादा लाभदायक दिखता है, बच्चों को काम पर भेजना या अपने साथ काम करवाना. गाँवों में इनकी संख्या अधिकतम हैं. सरकार की मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल आदि योजना ने इनके बच्चों को स्कूल से जोड़ा भी है. हालाँकि अब भी ढेर ऎसे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जाते, वजह है उनके माता-पिता में शिक्षा के प्रति सही जागरूकता का अभाव और शिक्षा के नाम पर चलाई जा रही रस्मी शिक्षा से उनका मोहभंग.    सरकारी कवायद में चौपट हुई पढ़ाई व्यवस्था ने उन परिवारों को मायूस कर दिया, जो गाँव में रहकर थोड़ी-बहुत खेती और छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हैं. वह शिक्षा के महत्व को समझते हैं और अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं. इस वजह से अब गाँव में भी प्रायवेट स्कूलों का चलन शुरू हो गया है. हालाँकि उन स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहद खराब है, क्योंकि ठीक-ठाक पढ़े-लिखे युवा गाँव में न तो रहना चाहते हैं, न जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि गाँव में उनका भविष्य संवरने के बजाय चौपट ही होगा.         
गाँव के स्कूलों में शिक्षा का माध्यम क्या हो, इस पर भी सरकारें अबतक कंफ्यूज हैं. नौकरियों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों की प्रधानता है, मगर हमारे गाँव के स्कूल अंग्रेजी माध्यम तो जाने छोड़िए, विषय के तौर पर पढ़ा पाने में भी फिसड्डी है. नतीजा है, पढ़ाई को लेकर गंभीर छात्र भी अंग्रेजी में कमजोर होने की वजह से आत्मविश्वास में कमी का शिकार शो जाते हैं, और शहरी छात्रों की तुलना में आत्महीनता से ग्रस्त हो जाते हैं. इस वजह से अच्छी नौकरियों में भी उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती. और ज्यादातर छात्र डिग्री होल्डर होकर भी बेरोजगार रह जाते हैं, या फिर छोटी-मोटी नौकरी कर शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं.
गाँव के विद्यार्थी दसवीं तक तो किसी तरह पढ़ ले रहे हैं, मगर कॉलेज की शिक्षा के लिए अभी भी वे शहरों पर ही आश्रित हैं. शहरों में किराये पर रूम लेकर रहना व अन्य ज़रूरतें पूरी करने में उन्हें हर महीने कमसेकम एक हज़ार रुपए की ज़रूरत पड़ती है. इनके माता-पिता जब प्राइमरी शिक्षा दिलाने में भी आर्थिक तौर पर असमर्थ हैं, तो अपने बच्चों को वे कॉलेज की शिक्षा कैसे दिला पाएँगे? इस विषय पर सरकार पूरी तरह मौन है. हमारी सरकारों को इस पर विचार करने की ज़रूरत है.
इनके लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. सरकार के सामने यह एक मुश्किल टास्क है, क्योंकि इसके लिए काफी धन और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है. मगर सरकार यदि सबको शिक्षा परक रोजगार देना चाहती है, तब तो उसे यह करना ही पड़ेगा. प्राचीन काल में इसीलिए कई सारे रोजगार पारम्परिक घरेलु प्रशिक्षण पर आधारित होते थे, जिनमें बच्चे परिवारगत रोजगार परिवार के साथ काम करके सीख लेते थे. ऎसे कार्यों में कृषि से लेकर, मिट्टी व धातु के वर्तन बनाना, लोहे के सामान बनाना, लकड़ी के सामान बनाना, चमड़े के सामान बनाना, कपड़े बनाना आदि रोजगार शामिल थे. इनके अलावा सैलून,लॉड्री आदि सेवापरक रोजगार भी पारम्परिक तौर पर ही बच्चे सीख लेते थे. मगर जाति और वर्ण के नाम पर भेदभाव और घृणा ने इन पारम्परिक शिक्षण को बेमानी बना दिया. अब हर किसी के लिए स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई अनिवार्य सी हो गई है. ऎसे में आवश्यक है कि सरकार गाँव के हर बच्चे के लिए कॉलेज में पढ़ाई की व्यवस्था करे. और जबतक सरकार ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने में स्वयं को असमर्थ पाती है, उसे वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करना होगा.
यह व्यवस्था दो तरह की हो सकती है- एक, गाँव के विद्यार्थियों के शहर स्थित कॉलेज आने-जाने के लिए बस की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराए या दूसरी, शहर में ही उनके निवास के लिए हॉस्टल का प्रबन्ध करे. लड़कियों को कॉलेज की शिक्षा दिलाने में ये प्रबन्ध बेशक उल्लेखनीय सुधार करेंगे. अभी लड़कियों की पढ़ाई तो तकरीबन अधूरी ही रह जाती है. लड़कियाँ चाहकर भी आर्थिक और असुरक्षा कारणों से भी कॉलेज की शिक्षा हासिल नहीं पाती. गरीबों को शिक्षा देने की सरकारी कवायद इन व्यवस्थाओं के बाद ही अपनी पूर्णता हासिल कर पाएगी.
‘हमारे गाँव’ गाँव के विद्यार्थियों को कॉलेज स्तर की शिक्षा मिले, इसके लिए सरकार का सहयोग उसी प्रकार करेगा, जिस प्रकार नालन्दा विश्वविद्यालय को चलाने में 200 गाँव किया करते थे.

Sunday, 9 February 2014

हमारे गाँव और सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान

हमारे गाँवों का मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है. कृषि उत्पादन पहले की अपेक्षा बढ़ा भी है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह दुखद सच उद्घाटित होता है कि दुनिया का हर दूसरा कुपोषित नागरिक भारतीय है. भारत सरकार  भी मानती है कि गाँव की 75% प्रजा भूख से जूझ रही है. निश्चित तौर पर यह हमारे लिए चिंता और चिंतन की बात है कि कृषिप्रधान देश होने के बावजूद हमारे देशवासी सेहत के योग्य भोजन पाने में अक्षम क्यों है, जबकि देश के सरकारी गोदाम अनाज से भरे हैं. रखे-रखे अनाज गोदामों में सड़ भी रहे हैं ?  सरकार इसकी वजह गरीबी को मानती है. आम आदमी गरीब है, इसलिए ज़रूरत भर अनाज भी वह खरीद नहीं पाती. सरकार इसमें अपनी असफलता मानने से भी नहीं हिचकती, क्योंकि गरीबी दूर नहीं कर पाने की वजह वह देश की बढ़ती जनसंख्या को मानती है, जिसके लिए उससे कहीं अधिक जिम्मेवार जनता है.    
बहरहाल, उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद भारत सरकार ने भोजन को नागरिक के अधिकार में शामिल किया, ताकि हर आदमी को दोनों समय का भोजन अनिवार्य रूप से मिल सके. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक नेक निर्णय है. एक तरफ अनाज गोदामों में सड़ता रहे और दूसरी तरफ जनता भूख से मर जाय, कुपोषण का शिकार बनकर बीमारियों से मर जाय, लोकतंत्र में इससे अधिक क्रूर मज़ाक कुछ और नहीं हो सकता. सरकार उन ज़रूरतमंदों तक अनाज पहुँचाने का काम करती है, बेशक यह एक उत्तम काम है, मगर सरकार जिस तरह से यह काम कर रही है, उसमें उसकी मंशा पर शक और सवाल दोनों खड़े होते हैं.
भारत की भूखी जनता तक अनाज पहुँचाने की व्यवस्था (पीडीएस) पहली बार 1940 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत को तब करनी पड़ी थी, जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था. उसके बाद भारत सरकार को फिर इस प्रणाली की मदद लेनी 60 के दशक में देश में आए भयंकर अकाल से जनता को बचाने के लिए. उसके बाद देश में हरित क्रांति आई, अनाज की पैदावार दूनी हो गई. इसके साथ ही बिजली के प्रसार और सिंचाई के लिए नहर आदि अन्य विकल्पों ने सूखे की आशंका को कमतर बना दिया. मगर पीडीएस फिर भी रुका नहीं, तब से वह  लगातार अपनी सेवा देता आ रहा है. और अब जब सरकार ने भोजन को नागरिक अधिकार में शामिल कर दिया है तब पीडीएस की भूमिका और उपयोगिता और बढ़ गई है. देशभर में अभी तकरीबन 5 लाख पीडीएस दुकानें हैं.
मगर गाँव के ज़रूरतमंदों तक सरकार जिस तरह से अनाज पहुँचाती है, वह अव्यावहारिक, खर्चीला और भ्रष्टाचार से भरी कुव्यवस्था का शिकार है. सरकार यह अनाज विदेशों से नहीं मँगवाती, बल्कि राज्य सरकारें गाँव के किसानों से ही खरीदकर भारत सरकार को देती है. भारत सरकार उस अनाज को शहर स्थित खाद्य निगम के गोदामों में जमा करती है. फिर केन्द्र सरकार पीडीएस के तहत बाँटने के लिए गोदाम से अनाज वापस राज्य सरकार के पास भेजती है और राज्य सरकार उसे गाँव स्थित पीडीएस दुकानों में भेजती है. यानी गाँव से शहर गया अनाज वापस गाँव आता है. इस तरह अनाज की इस आवाजाही में करोड़ों रुपयों का गैरज़रूरी खर्च तो होता ही है, अनाज की इस उठापटक में अनाज की अच्छी खासी बर्बादी भी होती है. जबकि यही अनाज पंचायत या ब्लॉक स्तर पर गोदाम बनाकर जमा किए जा सकते हैं और समय के साथ वहीं बाँटा जा सकता है. इससे अनाज की बर्बादी रुकेगी और रखरखाव पर खर्च भी कम आएगा.
फिर पीडीएस तक पहुँचने वाले अनाज की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती. यह अनाज प्रजा को कुपोषण से बचाने के लिए दिया जा रहा है, मगर वह नया और बढ़िया होने के बजाय पुराना और कई बार कीड़े लगे होते हैं. अनाज जिस राशन कार्ड के आधार पर बाँटा जाता है, उसमें भी गड़बड़ियाँ हैं. सही आदमी का राशन कार्ड असानी से बनता नहीं, वहीं जो ज़रूरतमंद नहीं हैं, वे भी गलत राशनकार्ड बनवाकर राशन उठा लेते हैं और बाज़ार की दुकानों में ज्यादा मूल्य पर बेच आते हैं. यह बेहद चिंताजनक है पीडीएस के भ्रष्टाचार में गाँव की सामान्य जनता भी शामिल हो गई है. कई जगह यह भी शिकायत मिलती है कि पीडीएस डीलर खुद ही अनाज को खुले बाज़ार में बेच देता है.
हालाँकि अब सरकार ज़रूरतमंद को सहायता पहुँचाने के बेहतर विकल्प के तौर पर नगद भुगतान करने की योजना बनाने जा रही है. सरकार की नीयत पर फिर भी सवाल उठ जाता  है कि सरकारी भोजन कराकर सरकार गरीब आदमी को भुखमरी के दलदल से निकालकर शारीरिक श्रम द्वारा अर्जित स्वाभिमान का भोजन करने का अवसर देना चाहती है या जीवन भर यूँ ही सरकारी भोजन कराकर सिर्फ वोट देने लायक बनाए रखना चाहती है?
सरकार वाहवाही के लिए अनाज बाँटती तो है, मगर इस बात की कभी जाँच नहीं करती कि सरकारी अनाज खाकर कुपोषित सेहतमन्द बने भी या नहीं,  और जो सेहतमंद हो गए, देश के लिए वह कौन सा काम कर रहे हैं? सिर्फ वोट के काम आ रहे हैं या देश के विकास में उनका सकारात्मक योगदान भी हो रहा है? या किसी अपराध या अपराधी की भेंट चढ़ गए? क्योंकि हमारे गाँव में यह कहावत बहुत प्रचलित है इंसान जैसा खाता है वैसा ही बनता है. 
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ऎसे किसी भी तन्दुरुस्त आदमी को मुफ्त भोजन देने के खिलाफ थे, जिसने ईमानदारी से कुछ न कुछ काम न किया हो. उनका कहना था कि मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन हुआ है. सुस्ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्साहन मिला है. नियम यह होना चाहिए कि मेहनत नहीं तो खाना नहीं. हाँ जो शरीर से लाचार हैं, उनका पोषण राज्य को करना चाहिए.
मगर वास्तविकता यह है कि पीडीएस लाचार, बीमार, वृद्ध और कुपोषितों का पोषण करने के बजाय भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय से लेकर गाँव के पीडीएस डीलर तक को भ्रष्टाचार करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है, और इसका लाभ उठानेवाली प्रजा को पेट भरने के लिए उद्यम करने के बजाय काहिल बने रहने के लिए प्रेरित करता है. नहीं तो, गाँव में गरीबी होने के बावजूद किसी काम के लिए मजदूरों की कमी नहीं होती. सिर्फ खेती के काम के लिए ही नहीं, जिसमें ज्यादा मजदूरी न देना किसानों की मजबूरी है, बल्कि अन्य कामों के लिए भी मजदूर नहीं मिलते.
‘हमारे गाँव’ में हमें ऎसी व्यवस्था विकसित करनी है कि गाँव के गरीब, अशक्त, लाचार, बीमार और वृद्ध को भोजन के लिए गाँव के बाहर मुँह ताकने की आवश्यकता ही न पड़े. इससे भूखे को भोजन देने के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार और देश की आमदनी का फिजूल खर्च रुकेगा. साथ ही, चूँकि यह व्यवस्था स्थानीय गाँववासियों की निर्वाचित कमिटी की देखरेख में चलेगी, इसलिए कौन वास्तविक ज़रूरतमंद है और कौन फर्जी, यह आसानी से परखा जा सकेगा. इससे भोजन सिर्फ ज़रूरतमंद को ही मिलेगा आलसियों और काहिलों को नहीं. और ‘हमारे गाँव’ में कमाकर खाने की भावना जीवित रहेगी.
मुम्बई. 07-02-2014
          







हमारे गाँव और संयुक्त परिवार

हमारे गाँव और संयुक्त परिवार
संयुक्त परिवार की अवधारणा दुनिया के मानव समाज को भारतीय संस्कृति की अद्भुत देन है. मगर दुनिया से क्या कहें, इसे हम भी सँभाल कर रख नहीं पा रहे हैं. संयुक्त परिवारों  को जिस तेजी से हम खत्म करते जा रहे हैं, वह भविष्य के लिए ठीक नहीं है. हम सब जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, फिर भी पता नहीं क्यों, हम एकाकी जीवन जीने की मूर्खतापूर्ण और स्वनाशी ज़िद में हैं.     
हमारे पूर्वजोंने मनुष्य जीवन को सर्वोत्तम जीवन माना और इस मनुष्य जीवन के परम आनन्द को प्राप्त करने के लिए हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का जीवन मंत्र दिया. यानी पूरी वसुधा के हर जीव यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी हमारे कुटुम्ब हैं. और अपने कुटुम्बों के साथ हम कैसे जिएँ, इसके लिए सह-अस्तित्व का मार्ग हमें दिखाया. हम इस मार्ग पर आस्था की हद तक विश्वास करके चलें, इसके लिए पूर्वजों ने सह-अस्तित्व को धर्म से जोड़ दिया. हमारे आराध्य देव शिव का परिवार सह-अस्तित्व की दिव्य मिसाल है. भगवान शिव के परिवार में पत्नी पार्वती के अलावा दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा बैल, शेर, साँप, मोर और चूहा भी रहते हैं. शेर बैल के लिए प्राणघातक हैं, तो साँप चूहे के लिए और मोर साँप के लिए, बावजूद इसके भगवान शिव के परिवार में सभी आनन्द से रहते हैं. तो, यह है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक पहुँचने का सह-अस्तित्व का दिव्य मार्ग! संयुक्त परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पहली कड़ी है, और हमारे गाँव में संयुक्त परिवार की बहुत ही पुरानी परम्परा है.
संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों तक भाइयों के परिवार के लोग एक साथ रहते हैं. यह सह अस्तित्व की भावना को मजबूत करता है. इसके चलते बचपन से ही इंसान में साथ जीने की भावना विकसित होती है, मजबूत होती है. व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द के बजाय सबकी पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखने का भाव बढ़ता है. कौन सदस्य कितना काम करता है और कौन सदस्य कितना खाता है, इस तरह की भावना बिल्कुल ही काम नहीं करती. सबको एक खास किस्म की आज़ादी होती है, शिकायत का भाव नहीं होता. खाने-पीने से लेकर सुविधाओं के उपभोग तक में समानता होती है. 
संयुकत परिवार व्यक्ति के अन्दर अनुशासन और मर्यादा का भाव आनुवांशिक तौर पर स्वतः विकसित हो जाता है. यहाँ व्यक्ति के निरंकुश होने की आशंका नहीं के बराबर होती है. क्योंकि परिवार के सारे सदस्यों पर ऊपर परिवार के मुखिया का पितृवत अंकुश होता है और परिवार के सदस्य परिवार के मुखिया के निर्णय को अंतिम और सर्वहिताय मानकर शिरोधारण करते हैं. परिवार का मुखिया भी निरंकुश नहीं होता, बल्कि अपने बड़े-बूढ़ों की सलाह से बँधा होता है.
संयुक्त परिवार में अधिकार पाने से ज्यादा त्याग का भाव होता है. क्योंकि परिवार का मुखिया सिर्फ अपनी पत्नी या बच्चे के लिए नहीं सोचता, बल्कि सबके लिए समान रूप से सोचता है. और जब त्याग करने की परिस्थिति बनती है, सबसे पहले स्वयं त्याग करता है और पत्नी-बच्चे पर भी त्याग के लिए नैतिक दबाव बनाता है. इस तरह विपत्ति के समय भी कोई सदस्य अकेला नहीं पड़ता.  
प्राचीन काल से ही हमारे गाँव कृषि प्रधान रहे, और कृषि एक ऎसा कार्य है जिसमें अपने  आदमियों की हमेशा ज़रूरत पड़ती है. शायद यह एक महत्वपूर्ण वजह रही होगी कि हमारे पूर्वजों ने संयुक्त परिवार के तौर पर रहना बेहतर समझा और इसे परम्परागत तौर पर सहस्रावदियों निभाया भी.
संयुक्त परिवार में दरार पड़ने की पहली वजह बनी अंग्रेजी सरकार, जिसने हमारी खेती चौपट की और हमारे गाँव चौपट किए. एकल परिवारों में पले-बढ़े और सिर्फ अपनी ही संस्कृति को महान समझने के मूढ़तापूर्ण अंधप्रेम में पड़े अंग्रेजों ने संयुक्त परिवार की विशिष्टता, उपयोगिता और गरिमा को जान ही न सके. उसके बाद, आजादी के बाद के शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव ने भी संयुक्त परिवार को अभूतपूर्व नुकसान पहुँचाया है. रोजी-रोजगार के लिए लिए शहरों की ओर लोगों का पलायन-विस्थापन और अपना मालिक खुद बनने की ज़रूरत भरे भाव ने संयुक्त परिवार से लोगों को दूर किया. नौकरी करनेवाले भाइयों ने खेती करनेवाले भाइयों को कम करके आँकना शुरू किया, जिनमें पत्नियों का अहम रोल रहा,और संयुक्त टूटने लगे.   
संयुक्त परिवार लगातार टूट रहे हैं, और उनकी जगह एकल परिवार ले रहे हैं. एकल परिवार, मूलतः विदेशी पारिवारिक अवधारणा है, जिसमें परिवार का मतलब पति-पत्नी और उनके बच्चे हैं. जहाँ माता-पिता के लिए भी जगह नहीं है. नतीजा है बुढ़ापे में अकेले छूट जाने या छोड़ दिए जाने की समस्या हमारे गाँव में भी लगातार बढ़ रही है. शहरों में तो वृद्धाश्रम होते हैं, जहाँ वृद्ध अपना बुढ़ापा गुजार लेते हैं, मगर हमारे गाँव में वृद्धाश्रम बनाने का प्रयास अभी तक न तो सरकारी और न ही सामाजिक स्तर पर हुआ है, इसलिए वृद्धों का जीवन बेहद एकाकी और दुखभरा देखने को मिल रहा है. हमारे गाँव के लोग चूँकि या तो खेती या स्वरोजगार से जुड़े हैं, इसलिए सरकारी नौकरी करनेवाले शहरियों की तरफ पेंशन नहीं मिलती और उनकी आर्थिक निर्भरता अपनी संतानों पर हो जाती है, इसलिए उन्हें बेटे-बहुओं की दया पर ही जीना पड़ता है. हालाँकि सरकार ने उनकी समस्या पर गौर करते हुए, वृद्धा पेंशन की शुरूआत की है, मगर यह उनके जीवन के लिए न सिर्फ नाकाफी है, बल्कि दुखदायी भी है, पेंशन की वजह से बेटे-बहू से मनमुटाव भी हो जाता है क्योंकि उसपर वृद्ध और बहू-बेटे में अधिकार की लड़ाई ठन जाती है. वृद्ध माता-पिता की देखभाल न करनेवालों के लिए सरकार ने जेल भेजने का कानून भी बनाया है. मगर क्या यह व्यावहारिक है कि अपना खून और दूध पिलाकर अपनी संतानों को बड़ा करनेवाले माँ-बाप, कानून का सहारा लेकर अपनी उपेक्षा करनेवाली संतानों को जेल भिजवाना चाहेंगे? बहरहाल, गाँव में भी वृद्ध जीवन दुखदायी हो गया है. जबकि संयुक्त परिवार में वृद्ध माता-पिता के साथ-साथ अशक्त और लाचार भाई-बहन भी सम्मान और सुखपूर्वक जीवन गुजार पाते थे.
‘हमारे गाँव’ में संयुक्त परिवार की परम्परा को पुनर्स्थापित करना है. तभी हम स्वयं भी सुखपूर्वक जीवन जी पाएँगे और पूर्वजों द्वारा दिया गया जीवन मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को भी साकार कर पाएँगे.
मुम्बई. 08-02-2014


           

           

Tuesday, 28 January 2014

क्या सब्सिडी गाँव को आत्मनिर्भर बनाने दिशा में मदद है

हमने 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना लिया...उसी परम्परागत तरीके से.मगर यह गणतंत्र तबतक इसी तरह रस्मी बना रहेगा, जबतक हमारे गाँव को महत्व दिया जाएगा...क्योंकि हमारा देश गाँवों का देश कल भी था और आज तमाम शहरी विकास के दावों के बावजूद हमारा देश गाँवों का देश है. 2011 की जनगणना बताती है कि अभी भी देश की 70 प्रतिशत आबादी गाँवो में रहती है. और गाँव में मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है. वह कृषि जो सदियों हमारी पूर्वजों को पालती रही, आजादी के 66 साल बाद भी हमारी जनतांत्रिक सरकार उस कृषि को लाभ के कारोबार में नहीं बदल सकी है. कृषि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार हर साल अरबों की सब्सिडी अपने विभिन्न विभागों के माध्यम से भेजती है, मगर किसान घाटे से उबर नहीं पा रहे हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं और किसान के बेटे खेती छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं. सवाल उठता है कि जब कृषि लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही, तो देश के अरबों रुपए सब्सिडी के नाम पर क्यों गाँव की मिट्टी में मिलाए जा रहे हैं ?  
सरकार इस सवाल का जवाब जानती है, मगर जानबूझकर इससे आँख मूदे है, क्योंकि जिस दिन कृषि लाभ के कारोबार में तब्दील होगी, सरकार की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का पोल खुल जाएगा. मामूली प्याज की कुछ दिनों की महँगाई जब सरकार की चूलें हिला देती है, तो चावल, दाल और गेहूँ की बढ़ी कीमत सरकार का क्या हाल करेगी? किसानों को बाज़ार में अपने अनाज की जो कीमत मिलती है, उसके लागत मूल्य से भी कम है. जिस दिन किसानों को मुनाफा सहित उसकी उपज का मूल्य मिलना शुरू होगा, सोचिए उस दिन क्या होगा? सामान्य चावल 40 की जगह 140 रुपए मिलेगा, गेहूँ भी सौ के पार चला जाएगा, सब्जियाँ भी कई गुणा महँगी हो जाएगी. क्या सरकार शहरी नागरिकों का गुस्सा बर्दास्त कर पाएगी?
आज़ादी के बाद हमारी सरकारें बड़ी चालाकी से अंग्रेजी नीति-रीति को पटरी पर चला रही है. जिस तरह अंग्रेजों ने गाँव को चूसकर शहरों को आबाद किया हमारी सरकारें भी वही कर रही हैं. और गाँव को स्कूल,अस्पताल और सड़कों से जोड़कर विकास को जन-जन तक पहुँचाने का छलभरा दावा कर रही है. अगर सचमुच सरकारों की गाँव का विकास करने इच्छा होती तो गाँव को सब्सिडी की बैसाखी, देने की बजाय गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करती, गाँव को वापस उसका सम्मान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाती. भारत गाँवों का देश है, भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और भारत एक कृषिप्रधान है, जबतक इसे हम गर्व से नहीं कह पाएँगे, तबतक हमारा गणतंत्र भारत के जन-जन का सच्चा गणतंत्र नहीं बन पाएगा. 


Saturday, 25 January 2014

हमारे गाँव और हमारा गणतंत्र

धनंजय कुमार
हम सब 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. हालाँकि हमारे देश में गणतंत्र की परम्परा बहुत पुरानी है. हमारा लिच्छवि (वैशाली) गणराज्य दुनिया का पहला गणतंत्र था, इसे तो सब जानते ही हैं. इतिहासकार बताते हैं कि उससे भी पहले से, वैदिक काल से ही हम जनतंत्रवादी रहे हैं. जनता द्वारा सरकार भले नहीं चुनी जाती थी, शासन की बागडोर राजा के हाथ में होती थी, तब भी ग्रामसभाओं का वजूद था और ग्रामसभा अपने गाँव-समाज की समस्याओं पर फैसले लिया करती थी. उनके निर्णयों को राजा भी भरपूर सम्मान देते थे. गणतंत्र की यह परम्परा हमारे देश में अंग्रजों के आने से पहले तक निर्बाध चल रही थी, हालाँकि अग्रेंजो से पहले भी दुनिया के तमाम आक्रमणकारी देशों और उनके राजाओं ने भारतवर्ष पर शासन किया,  मगर गाँव की जनतांत्रिक प्रक्रिया पर किसी ने अपना तंत्र नहीं थोपा.
हमारे इस ग्रामीण जनतांत्रिक व्यवस्था को मिटाने का काम किया अंग्रेजों ने. उसने जमींदारी प्रथा शुरू की और ग्रामसभाओं का महत्व खत्म कर दिया. ज़मीन्दार को गाँव का सर्वेसर्वा बना दिया गया और जमींदारों पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने अपने अधिकारी बहाल कर दिए. जो ग्रामसभाएँ पहले अपनी आंतरिक समस्याएँ खुद निबटा लिया करती थीं, उसके लिए अब उन्हें शासन के अनुसार चलने को मजबूर होना पड़ा. शासन का ध्यान उनकी समस्याओं के निबटारे के बजाय राजस्व उगाही में ज्यादा था, लिहाजा, ज़मीन्दार और अंग्रेज सरकार के अधिकारी, दोनों का सिंडिकेट ग्रामीणों के शोषण में जुट गया.
और यहीं से शुरू हुई हमारे गाँव की तबाही. अंग्रेजों की राजस्व उगाही नीति ने हमारे गाँवों के राजनीतिक-सामाजिक ढाँचे को तो छिन्न-भिन्न किया ही, आर्थिक ढाँचे को भी तहस-नहस कर दिया. हमारे गाँव, जो कलतक, अपनी ज़रूरतें पूरी कर चुकने के बाद राज्य के कोषागार में भी अपना अमूल्य योगदान कर दिया करते थे, अब अपनी ज़रूरत पूरी करने में भी अक्षम होने लगे.
हमारे गाँव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी कृषि, जो ज़मीन्दारी प्रथा की वजह से चौपट हो गई. कृषि से किसानों-मज़दूरों का पेट भरना भी मुश्किल होने लगा. और यहीं से भारतीय ग्रामीण सरकारी नौकरियों की तरफ उन्मुख होने लगे.
अंग्रेजों की दरअसल यह सोची समझी चाल थी, इस तरह से वह गाँव की आत्मनिर्भरता को समाप्त करने में कामयाब हुए. साथ ही गाँववासियों को रोटी-रोजगार के लिए नौकरी की तरफ आकर्षित कर अंग्रेजों ने हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे को भी अभूतपूर्व क्षति पहुँचाई. संयुक्त परिवार हमारे गाँव-समाज की हमारी विलक्षण विशेषता थी. बड़ी से बड़ी आपदा भी हम जिसके बल पर झेल जाया करते थे, वह ध्वस्त होने लगी. ग्रामसभाओं के बहाने सामाजिक स्तर पर गाँववासियों का जो आपस में संवाद था, वह समाप्त हो गया. भाषा के स्तर पर भी अंग्रेजों ने हमें अलग-थलग करने की कामयाब चाल चली, कि हमारी अपनी भाषा हेय और उनकी भाषा इंग्लिश महान लगने लगी. इस तरह धीरे-धीरे बड़े ही सुनियोजित तरीके से अंग्रेज हमें गुलाम बनाने में पूरी तरह कामयाब हो गए.
लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारतवर्ष अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ. हमारे नेताओं ने अपनी सरकार बनाई, और 26 जनवरी 1950 को भारत का अपना संविधान देश की जनता को समर्पित किया गया. हम भारतवासियों को, नागरिक के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ को सरकार चुनने का अधिकार भी दिया गया. और भारतवर्ष जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासित गणतांत्रिक देश बन गया.
देश की जनता के लिए यह बड़ा ही खुशी का दिन था कि वह अब किसी का गुलाम नहीं था. उसपर अब कोई जबरदस्ती, उनकी मर्जी के विपरीत, अपना हित साधने के लिए नियम-कानून और व्यवस्था नहीं थोप सकता था, क्योंकि अब सरकार चुनने का अधिकार जनता को मिल चुका था. पिछले 64 सालों से हम, इसी खुशी में आज के दिन को गणतंत्र दिवस के तौर पर सेलीव्रेट कर रहे हैं. आज हम 65वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. मगर क्या यह वास्तव में वह गणतंत्र है, जो अंग्रेजों से पहले हमें प्राप्त था ?
गाँव को अधिकार देने के उद्देश्य से हमारी सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था फिर से कायम तो की, मगर ग्रामसभाओं को अपने गाँव के सन्दर्भ में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया. हालाँकि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने ग्रामसभाओं को अपने विकास से सम्बन्धित कुछ निर्णय लेने और योजना बनाने का अधिकार तो दिया है, मगर सरकार ने अपना दखल वैसे ही बनाए रखा है, जैसे अंग्रेजी शासन में था. ज्यादातर योजनाएँ अभी भी दिल्ली से बनकर गाँव तक पहुँच रही हैं.
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि गाँव की आत्मनिर्भरता. गाँव जबतक आत्मनिर्भर नहीं होते, तबतक हमारा गणतंत्र अधूरा है. हमारे गाँव कृषि आधरित थे, जिसे अंग्रेजों ने चौपट कर दिया, हमारी सरकार हरित क्रांति के बावजूद उस कृषि आधार को अबतक पुनर्जीवित नहीं कर पाई है. क्योंकि हमारी सरकार ने भी अंग्रेजी सरकार की तरह ही गाँव और कृषि के बजाय शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को विकास का माध्यम माना. और कृषि को बढ़ावा देने के बजाय उसे गर्त में जाने दिया. 
सरकार यदि कृषि को बढ़ावा देने की नीयत रखती तो किसान को बाज़ार से उसकी उपज का मुनाफा सहित मूल्य दिलाती, मगर सरकार ने किसानों के साथ छल किया और उसे सब्सिडी का झुनझुना पकड़ा दिया. नतीजा हुआ किसान तरक्की करने के बजाय लगातार पिछड़ता चला गया, और उसकी अगली पीढ़ी के सामने गाँव से पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.
आज गाँव की स्थिति यह है कि पढ़े-लिखे लोग हों या अनपढ़ मजदूर, कोई गाँव में रहना नहीं चाहता. विडम्बना यह है कि सरकार अभी भी नहीं जागी है. गाँव का विकास करने के उद्देश्य से सरकार गाँव को स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों से जोड़ तो रही है, मगर गाँव की स्थिति इससे सुधर नहीं रही है. गाँव से लोगों का पलायन बदस्तूर जारी है. और यह स्थिति तबतक यथावत रहेगी जबतक गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार कारगर कदम नहीं उठाती. और वह कारगर कदम कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने अलावा कुछ भी नहीं हो सकता.
अब देखना है हमारी सरकार हमारे गाँव का कब वास्तविक महत्व समझती है. और वास्तविक गणतंत्र इस देश में उसी दिन आएगा, जब गाँव को महत्व दिया जाएगा. गाँव आत्मनिर्भर होगा और गाँव में रहना सम्मान का विषय होगा.




Tuesday, 24 December 2013

स्त्री स्वर

मैं सामान नहीं हूँ, मैं जागीर नहीं हूँ
मुझसे यूँ न खेलो, मैं बस देह नहीं हूँ.

गुड्डी-गुड़िया नहीं पुकारो, कुल का दीपक हूँ मैं,
मैं भी नभ को छू सकती हूँ, जग की रौनक हूँ मैं.

कबतक ज़ुल्म करोगे, कब साथी समझोगे?
कभी हृदय से पूछो क्या मेरे बिन जी लोगे ?

छाया बनकर रही प्रेमवश,तुमने अक्षम माना
मुझको हर रिश्ते में लेकिन तुमने गलत ही जाना

देवी मुझको मत बोलो, बस इंसा ही रहने दो
मेरे हिस्से का सुख दे दो, मुझको भी जीने दो

मुझको कम ना आँको, ज़रा न तुमसे कम हूँ
मैं ममता,साहस, कौशल्य तीनों का संगम हूँ

धनंजय कुमार

Sunday, 1 December 2013

ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है, मगर आज़ादी के बाद हमारे गाँवों को हमने लगातार उजाड़ा. हमारी सरकारों ने प्रगति और विकास के पथ से गाँवों को दूर रखा, तो हमने दुनिया की दौड़ में खुद को आगे रखने की ललक में गाँवों को दुत्कार-डपट शहरों की चमक-दमक को ह्रदय में बसाया. और हमारे गाँव लगातार हमसे छूटते गए...मुरझाते गए, सूखते गए.
कहने तो सरकार ने आज़ादी के बाद लगातार गाँवों के विकास को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाई हैं, मगर क्या वो नीतियाँ फलदायी रहीं ? जवाब बिना हील-हुज्जत के ‘नहीं’ है. अगर फलदायी होतीं तो हमारे गाँव हाशिए पर नहीं चले जाते. गाँव छोड़कर हम भागते नहीं. हमारे गाँव संसाधनविहीन, प्रतिभाविहीन और ऊर्जाविहीन नहीं हो जाते.
ग्राम विकास के नाम पर सरकारों ने किसानों की सहायता करने की नीतियाँ बनाईं. उन्हें तरह – तरह की सब्सिडियाँ दी गई. मॉनसून के भरोसे खेती को नदियों पर बाँध बना, नहरों को खेतों से जोड़ और नलकूप की व्यवस्था कर कृत्रिम सिंचाई का सहारा दिया गया. परम्परावादी खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की कोशिशें हुईं. किसानों को अपने उत्पाद की सही कीमत मिले इसके लिए सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित किया जाने लगा. मंडियाँ बनाई गईं. किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, इसके लिए उन्हें आयकर से मुक्त रखा गया. मगर आज 65 सालों की सरकारी कवायद के बाद भी किसानों की स्थिति क्या है..? किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं, जो नहीं भाग सकते आत्महत्या कर रहे हैं.
आज आज़ादी के 65-66 साल बाद भी गाँवों को सँवारने की प्रक्रिया में जो सरकारी नीतियाँ खूब ढोल-बाजे के साथ अमल में लाई जा रही है,वह भी निरंतर उजड़ रहे गाँव को सँवारने की दिशा में ‘बीमारी कुछ इलाज कुछ’ की तरह किया जा रहा है. यही वजह है कि ग्राम पंचायतों को आर्थिक अधिकार देने, ग्रामीणों को तरह-तरह की आर्थिक सहायता (मनरेगा आदि) देने के बावजूद गाँव उजड़ रहे हैं. ग्राम विकास और ग्रामवासियों की आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर सरकारों द्वारा मुक्त हस्त लुटाई जा रही धनराशि जनता के हित में इस्तेमाल कम बर्बाद ज्यादा हो रही है. मुखिया जी गाँव के मालिक बन गए हैं. जो बीडीओ और जिलाधीश को खुश करके सरकारी धन का अपूर्व आनन्द प्राप्त कर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि आम जनता भी इस सरकारी लूट से खुश है. आखिर खुश हो भी क्यों नहीं...हर तरीके की लूट में शामिल होने की उन्हें भी छूट है. कुछ रुपए की रिश्वत देकर गलत तथ्य पर आय प्रमाण पत्र से लेकर वैसे तमाम प्रमाणपत्र आराम से बन जा रहे हैं, जिनसे सरकारी सब्सिडियों की रेवड़ियाँ प्राप्त हो जाती हैं. विकास के नाम पर सड़कें बन रही हैं, इन्दिरा आवास बन रहे हैं, सामुदायिक भवन बन रहे हैं. रोजगार के नाम पर मनरेगा के तहत पेड़ लगाए जा रहे हैं, गलियाँ बनाई जा रही हैं, घर-घर शौचालय बनाए जा रहे हैं. किसानों को सहायता के नाम पर खाद-बीज से लेकर ट्रैक्टर-पॉलीहाउस पर हज़ारों-लाखों की सरकारी सब्सिडी जबरन बाँटी जा रही हैं. शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए आँगनबाड़ी से लेकर कस्तूरबा विद्यालय बनाए जा रहे हैं. कॉपी-किताब से लेकर मिड डे मील-सायकिल और लैपटॉप बाँटे जा रहे हैं. ओह...! सार कहें तो हमारे गाँवों में मॉनसून से कई गुणा ज्यादा सरकारी धन बरस रहा है. मगर अफसोस की बात यह है कि जैसे बरसात के पानी को हम बेकार बह जाने देते हैं, वैसे ही सरकारी धन भी अनुपयोगी तरीके से बहाया जा रहा है. गाँव में एक कहावत है चोरों के सन्दर्भ में- ‘लूट लाए कूट खाए’, इसीलिए चोरों की आर्थिक स्थिति कभी सुधरती नहीं, सरकारी धन की भी यही स्थिति है, यही कारण है कि सालाना लाखों-करोड़ों लुटाए जाने के बाद भी गाँव की स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है. प्रतिभा और मजदूर रोटी-रोजगार के लिए बदस्तूर पलायन कर रहे हैं. और बेहतर जीवन की ललक में ग्रामवासियों का बेहतर डेस्टिनेशन अब भी शहर ही है. इससे यह स्पष्ट जाहिर होता है कि हमारे गाँव को लेकर अबतक सरकारों की जो दृष्टि और नीतियाँ रही हैं वह गलत रही हैं.
महात्मा गाँधी ने गाँवों के विकास का जो स्वप्न देखा था, उसमें गाँव को आत्मनिर्भरता प्रदान करने की कल्पना थी. लोकतंत्र को राजधानियों तक सीमित रखने के बजाय गाँव तक पसारने की चाहत थी, मगर हमारे नीति-नियंताओं ने गाँवों के साथ-साथ गाँधी को भी ठगा. लोकतंत्र को जनता से जोड़ने के नाम पर ग्राम-पंचायतों का गठन तो किया गया, मगर ठीक वैसे ही जैसे बच्चों को बड़े नकली खिलौनों से बहला लेते हैं. सत्ता जनप्रतिनिधियों की अंजुरी से चलकर नौकरशाहों की जटा में समा गई. जनता ‘अमूल्य वोट’ का अधिकार पाकर धन्य हो गई. जनप्रतिनिधियों को राजधानियों का सुख प्राप्त हुआ तो नौकरशाहों को राजधानियों अथवा जिला मुख्यालयों का और जनता के नसीब में रहे गाँव. जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों को ही विकास की रूपरेखा तय करनी थी, इसलिए सरकारी धनों से पहला विकास राजधानियों का हुआ फिर जिला मुख्यालयों का. विकास के बजट से गाँव के विकास की बारी आई बिल्कुल आखिर में. यानी अब जब मामला बिल्कुल भयावह हो गया. वो भी तब जब नीति-नियंताओं को लगने लगा कि गाँव की आबादी को अगर गाँव में नहीं रोका गया तो हमारे शहर अस्त-व्यस्त हो जाएँगे.
कलतक गाँवों को विकास की पटरी से दूर रखा गया, वह साज़िश थी, मगर आज गाँवों के विकास के नाम पर जो धन लुटाया जा रहा है, वह नीति-नियंताओं की हवाई समझ है. खैरात बाँटने से न तो ग्रामवासियों का भला होना है, न ही हमारे गाँव का विकास होना है. ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए. मनरेगा और सब्सिडी से ग्रामवासियों को गाँव में नहीं रोका जा सकता. ग्रामवासी गाँव में रहना तब पसन्द करेंगे जब गाँव में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध होंगे. सिर्फ कम कीमत पर अनाज देने, इन्दिरा आवास बना देने और स्कूलों के नाम पर भवन खड़ा कर देने और प्राइमरी हेल्थ सेंटर बना देने भर से ग्रामवासी खुशहाल नहीं हो जाएँगे. वह खुशहाल तब होंगे, जब उनके जीवन के मूलभूत सपने गाँव में ही पूरे हो सकेंगे.           

 
हमारे गाँव के सर्जक धनंजय कुमार बिन्द प्रखण्ड के बीडीओ अशोक कुमार जी के साथ 

शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक पहल 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल.