Tuesday, 28 January 2014

क्या सब्सिडी गाँव को आत्मनिर्भर बनाने दिशा में मदद है

हमने 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना लिया...उसी परम्परागत तरीके से.मगर यह गणतंत्र तबतक इसी तरह रस्मी बना रहेगा, जबतक हमारे गाँव को महत्व दिया जाएगा...क्योंकि हमारा देश गाँवों का देश कल भी था और आज तमाम शहरी विकास के दावों के बावजूद हमारा देश गाँवों का देश है. 2011 की जनगणना बताती है कि अभी भी देश की 70 प्रतिशत आबादी गाँवो में रहती है. और गाँव में मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है. वह कृषि जो सदियों हमारी पूर्वजों को पालती रही, आजादी के 66 साल बाद भी हमारी जनतांत्रिक सरकार उस कृषि को लाभ के कारोबार में नहीं बदल सकी है. कृषि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार हर साल अरबों की सब्सिडी अपने विभिन्न विभागों के माध्यम से भेजती है, मगर किसान घाटे से उबर नहीं पा रहे हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं और किसान के बेटे खेती छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं. सवाल उठता है कि जब कृषि लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही, तो देश के अरबों रुपए सब्सिडी के नाम पर क्यों गाँव की मिट्टी में मिलाए जा रहे हैं ?  
सरकार इस सवाल का जवाब जानती है, मगर जानबूझकर इससे आँख मूदे है, क्योंकि जिस दिन कृषि लाभ के कारोबार में तब्दील होगी, सरकार की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का पोल खुल जाएगा. मामूली प्याज की कुछ दिनों की महँगाई जब सरकार की चूलें हिला देती है, तो चावल, दाल और गेहूँ की बढ़ी कीमत सरकार का क्या हाल करेगी? किसानों को बाज़ार में अपने अनाज की जो कीमत मिलती है, उसके लागत मूल्य से भी कम है. जिस दिन किसानों को मुनाफा सहित उसकी उपज का मूल्य मिलना शुरू होगा, सोचिए उस दिन क्या होगा? सामान्य चावल 40 की जगह 140 रुपए मिलेगा, गेहूँ भी सौ के पार चला जाएगा, सब्जियाँ भी कई गुणा महँगी हो जाएगी. क्या सरकार शहरी नागरिकों का गुस्सा बर्दास्त कर पाएगी?
आज़ादी के बाद हमारी सरकारें बड़ी चालाकी से अंग्रेजी नीति-रीति को पटरी पर चला रही है. जिस तरह अंग्रेजों ने गाँव को चूसकर शहरों को आबाद किया हमारी सरकारें भी वही कर रही हैं. और गाँव को स्कूल,अस्पताल और सड़कों से जोड़कर विकास को जन-जन तक पहुँचाने का छलभरा दावा कर रही है. अगर सचमुच सरकारों की गाँव का विकास करने इच्छा होती तो गाँव को सब्सिडी की बैसाखी, देने की बजाय गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करती, गाँव को वापस उसका सम्मान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाती. भारत गाँवों का देश है, भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और भारत एक कृषिप्रधान है, जबतक इसे हम गर्व से नहीं कह पाएँगे, तबतक हमारा गणतंत्र भारत के जन-जन का सच्चा गणतंत्र नहीं बन पाएगा. 


Saturday, 25 January 2014

हमारे गाँव और हमारा गणतंत्र

धनंजय कुमार
हम सब 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. हालाँकि हमारे देश में गणतंत्र की परम्परा बहुत पुरानी है. हमारा लिच्छवि (वैशाली) गणराज्य दुनिया का पहला गणतंत्र था, इसे तो सब जानते ही हैं. इतिहासकार बताते हैं कि उससे भी पहले से, वैदिक काल से ही हम जनतंत्रवादी रहे हैं. जनता द्वारा सरकार भले नहीं चुनी जाती थी, शासन की बागडोर राजा के हाथ में होती थी, तब भी ग्रामसभाओं का वजूद था और ग्रामसभा अपने गाँव-समाज की समस्याओं पर फैसले लिया करती थी. उनके निर्णयों को राजा भी भरपूर सम्मान देते थे. गणतंत्र की यह परम्परा हमारे देश में अंग्रजों के आने से पहले तक निर्बाध चल रही थी, हालाँकि अग्रेंजो से पहले भी दुनिया के तमाम आक्रमणकारी देशों और उनके राजाओं ने भारतवर्ष पर शासन किया,  मगर गाँव की जनतांत्रिक प्रक्रिया पर किसी ने अपना तंत्र नहीं थोपा.
हमारे इस ग्रामीण जनतांत्रिक व्यवस्था को मिटाने का काम किया अंग्रेजों ने. उसने जमींदारी प्रथा शुरू की और ग्रामसभाओं का महत्व खत्म कर दिया. ज़मीन्दार को गाँव का सर्वेसर्वा बना दिया गया और जमींदारों पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने अपने अधिकारी बहाल कर दिए. जो ग्रामसभाएँ पहले अपनी आंतरिक समस्याएँ खुद निबटा लिया करती थीं, उसके लिए अब उन्हें शासन के अनुसार चलने को मजबूर होना पड़ा. शासन का ध्यान उनकी समस्याओं के निबटारे के बजाय राजस्व उगाही में ज्यादा था, लिहाजा, ज़मीन्दार और अंग्रेज सरकार के अधिकारी, दोनों का सिंडिकेट ग्रामीणों के शोषण में जुट गया.
और यहीं से शुरू हुई हमारे गाँव की तबाही. अंग्रेजों की राजस्व उगाही नीति ने हमारे गाँवों के राजनीतिक-सामाजिक ढाँचे को तो छिन्न-भिन्न किया ही, आर्थिक ढाँचे को भी तहस-नहस कर दिया. हमारे गाँव, जो कलतक, अपनी ज़रूरतें पूरी कर चुकने के बाद राज्य के कोषागार में भी अपना अमूल्य योगदान कर दिया करते थे, अब अपनी ज़रूरत पूरी करने में भी अक्षम होने लगे.
हमारे गाँव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी कृषि, जो ज़मीन्दारी प्रथा की वजह से चौपट हो गई. कृषि से किसानों-मज़दूरों का पेट भरना भी मुश्किल होने लगा. और यहीं से भारतीय ग्रामीण सरकारी नौकरियों की तरफ उन्मुख होने लगे.
अंग्रेजों की दरअसल यह सोची समझी चाल थी, इस तरह से वह गाँव की आत्मनिर्भरता को समाप्त करने में कामयाब हुए. साथ ही गाँववासियों को रोटी-रोजगार के लिए नौकरी की तरफ आकर्षित कर अंग्रेजों ने हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे को भी अभूतपूर्व क्षति पहुँचाई. संयुक्त परिवार हमारे गाँव-समाज की हमारी विलक्षण विशेषता थी. बड़ी से बड़ी आपदा भी हम जिसके बल पर झेल जाया करते थे, वह ध्वस्त होने लगी. ग्रामसभाओं के बहाने सामाजिक स्तर पर गाँववासियों का जो आपस में संवाद था, वह समाप्त हो गया. भाषा के स्तर पर भी अंग्रेजों ने हमें अलग-थलग करने की कामयाब चाल चली, कि हमारी अपनी भाषा हेय और उनकी भाषा इंग्लिश महान लगने लगी. इस तरह धीरे-धीरे बड़े ही सुनियोजित तरीके से अंग्रेज हमें गुलाम बनाने में पूरी तरह कामयाब हो गए.
लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारतवर्ष अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ. हमारे नेताओं ने अपनी सरकार बनाई, और 26 जनवरी 1950 को भारत का अपना संविधान देश की जनता को समर्पित किया गया. हम भारतवासियों को, नागरिक के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ को सरकार चुनने का अधिकार भी दिया गया. और भारतवर्ष जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासित गणतांत्रिक देश बन गया.
देश की जनता के लिए यह बड़ा ही खुशी का दिन था कि वह अब किसी का गुलाम नहीं था. उसपर अब कोई जबरदस्ती, उनकी मर्जी के विपरीत, अपना हित साधने के लिए नियम-कानून और व्यवस्था नहीं थोप सकता था, क्योंकि अब सरकार चुनने का अधिकार जनता को मिल चुका था. पिछले 64 सालों से हम, इसी खुशी में आज के दिन को गणतंत्र दिवस के तौर पर सेलीव्रेट कर रहे हैं. आज हम 65वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. मगर क्या यह वास्तव में वह गणतंत्र है, जो अंग्रेजों से पहले हमें प्राप्त था ?
गाँव को अधिकार देने के उद्देश्य से हमारी सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था फिर से कायम तो की, मगर ग्रामसभाओं को अपने गाँव के सन्दर्भ में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया. हालाँकि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने ग्रामसभाओं को अपने विकास से सम्बन्धित कुछ निर्णय लेने और योजना बनाने का अधिकार तो दिया है, मगर सरकार ने अपना दखल वैसे ही बनाए रखा है, जैसे अंग्रेजी शासन में था. ज्यादातर योजनाएँ अभी भी दिल्ली से बनकर गाँव तक पहुँच रही हैं.
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि गाँव की आत्मनिर्भरता. गाँव जबतक आत्मनिर्भर नहीं होते, तबतक हमारा गणतंत्र अधूरा है. हमारे गाँव कृषि आधरित थे, जिसे अंग्रेजों ने चौपट कर दिया, हमारी सरकार हरित क्रांति के बावजूद उस कृषि आधार को अबतक पुनर्जीवित नहीं कर पाई है. क्योंकि हमारी सरकार ने भी अंग्रेजी सरकार की तरह ही गाँव और कृषि के बजाय शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को विकास का माध्यम माना. और कृषि को बढ़ावा देने के बजाय उसे गर्त में जाने दिया. 
सरकार यदि कृषि को बढ़ावा देने की नीयत रखती तो किसान को बाज़ार से उसकी उपज का मुनाफा सहित मूल्य दिलाती, मगर सरकार ने किसानों के साथ छल किया और उसे सब्सिडी का झुनझुना पकड़ा दिया. नतीजा हुआ किसान तरक्की करने के बजाय लगातार पिछड़ता चला गया, और उसकी अगली पीढ़ी के सामने गाँव से पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.
आज गाँव की स्थिति यह है कि पढ़े-लिखे लोग हों या अनपढ़ मजदूर, कोई गाँव में रहना नहीं चाहता. विडम्बना यह है कि सरकार अभी भी नहीं जागी है. गाँव का विकास करने के उद्देश्य से सरकार गाँव को स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों से जोड़ तो रही है, मगर गाँव की स्थिति इससे सुधर नहीं रही है. गाँव से लोगों का पलायन बदस्तूर जारी है. और यह स्थिति तबतक यथावत रहेगी जबतक गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार कारगर कदम नहीं उठाती. और वह कारगर कदम कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने अलावा कुछ भी नहीं हो सकता.
अब देखना है हमारी सरकार हमारे गाँव का कब वास्तविक महत्व समझती है. और वास्तविक गणतंत्र इस देश में उसी दिन आएगा, जब गाँव को महत्व दिया जाएगा. गाँव आत्मनिर्भर होगा और गाँव में रहना सम्मान का विषय होगा.




Tuesday, 24 December 2013

स्त्री स्वर

मैं सामान नहीं हूँ, मैं जागीर नहीं हूँ
मुझसे यूँ न खेलो, मैं बस देह नहीं हूँ.

गुड्डी-गुड़िया नहीं पुकारो, कुल का दीपक हूँ मैं,
मैं भी नभ को छू सकती हूँ, जग की रौनक हूँ मैं.

कबतक ज़ुल्म करोगे, कब साथी समझोगे?
कभी हृदय से पूछो क्या मेरे बिन जी लोगे ?

छाया बनकर रही प्रेमवश,तुमने अक्षम माना
मुझको हर रिश्ते में लेकिन तुमने गलत ही जाना

देवी मुझको मत बोलो, बस इंसा ही रहने दो
मेरे हिस्से का सुख दे दो, मुझको भी जीने दो

मुझको कम ना आँको, ज़रा न तुमसे कम हूँ
मैं ममता,साहस, कौशल्य तीनों का संगम हूँ

धनंजय कुमार

Sunday, 1 December 2013

ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है, मगर आज़ादी के बाद हमारे गाँवों को हमने लगातार उजाड़ा. हमारी सरकारों ने प्रगति और विकास के पथ से गाँवों को दूर रखा, तो हमने दुनिया की दौड़ में खुद को आगे रखने की ललक में गाँवों को दुत्कार-डपट शहरों की चमक-दमक को ह्रदय में बसाया. और हमारे गाँव लगातार हमसे छूटते गए...मुरझाते गए, सूखते गए.
कहने तो सरकार ने आज़ादी के बाद लगातार गाँवों के विकास को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाई हैं, मगर क्या वो नीतियाँ फलदायी रहीं ? जवाब बिना हील-हुज्जत के ‘नहीं’ है. अगर फलदायी होतीं तो हमारे गाँव हाशिए पर नहीं चले जाते. गाँव छोड़कर हम भागते नहीं. हमारे गाँव संसाधनविहीन, प्रतिभाविहीन और ऊर्जाविहीन नहीं हो जाते.
ग्राम विकास के नाम पर सरकारों ने किसानों की सहायता करने की नीतियाँ बनाईं. उन्हें तरह – तरह की सब्सिडियाँ दी गई. मॉनसून के भरोसे खेती को नदियों पर बाँध बना, नहरों को खेतों से जोड़ और नलकूप की व्यवस्था कर कृत्रिम सिंचाई का सहारा दिया गया. परम्परावादी खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की कोशिशें हुईं. किसानों को अपने उत्पाद की सही कीमत मिले इसके लिए सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित किया जाने लगा. मंडियाँ बनाई गईं. किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, इसके लिए उन्हें आयकर से मुक्त रखा गया. मगर आज 65 सालों की सरकारी कवायद के बाद भी किसानों की स्थिति क्या है..? किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं, जो नहीं भाग सकते आत्महत्या कर रहे हैं.
आज आज़ादी के 65-66 साल बाद भी गाँवों को सँवारने की प्रक्रिया में जो सरकारी नीतियाँ खूब ढोल-बाजे के साथ अमल में लाई जा रही है,वह भी निरंतर उजड़ रहे गाँव को सँवारने की दिशा में ‘बीमारी कुछ इलाज कुछ’ की तरह किया जा रहा है. यही वजह है कि ग्राम पंचायतों को आर्थिक अधिकार देने, ग्रामीणों को तरह-तरह की आर्थिक सहायता (मनरेगा आदि) देने के बावजूद गाँव उजड़ रहे हैं. ग्राम विकास और ग्रामवासियों की आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर सरकारों द्वारा मुक्त हस्त लुटाई जा रही धनराशि जनता के हित में इस्तेमाल कम बर्बाद ज्यादा हो रही है. मुखिया जी गाँव के मालिक बन गए हैं. जो बीडीओ और जिलाधीश को खुश करके सरकारी धन का अपूर्व आनन्द प्राप्त कर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि आम जनता भी इस सरकारी लूट से खुश है. आखिर खुश हो भी क्यों नहीं...हर तरीके की लूट में शामिल होने की उन्हें भी छूट है. कुछ रुपए की रिश्वत देकर गलत तथ्य पर आय प्रमाण पत्र से लेकर वैसे तमाम प्रमाणपत्र आराम से बन जा रहे हैं, जिनसे सरकारी सब्सिडियों की रेवड़ियाँ प्राप्त हो जाती हैं. विकास के नाम पर सड़कें बन रही हैं, इन्दिरा आवास बन रहे हैं, सामुदायिक भवन बन रहे हैं. रोजगार के नाम पर मनरेगा के तहत पेड़ लगाए जा रहे हैं, गलियाँ बनाई जा रही हैं, घर-घर शौचालय बनाए जा रहे हैं. किसानों को सहायता के नाम पर खाद-बीज से लेकर ट्रैक्टर-पॉलीहाउस पर हज़ारों-लाखों की सरकारी सब्सिडी जबरन बाँटी जा रही हैं. शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए आँगनबाड़ी से लेकर कस्तूरबा विद्यालय बनाए जा रहे हैं. कॉपी-किताब से लेकर मिड डे मील-सायकिल और लैपटॉप बाँटे जा रहे हैं. ओह...! सार कहें तो हमारे गाँवों में मॉनसून से कई गुणा ज्यादा सरकारी धन बरस रहा है. मगर अफसोस की बात यह है कि जैसे बरसात के पानी को हम बेकार बह जाने देते हैं, वैसे ही सरकारी धन भी अनुपयोगी तरीके से बहाया जा रहा है. गाँव में एक कहावत है चोरों के सन्दर्भ में- ‘लूट लाए कूट खाए’, इसीलिए चोरों की आर्थिक स्थिति कभी सुधरती नहीं, सरकारी धन की भी यही स्थिति है, यही कारण है कि सालाना लाखों-करोड़ों लुटाए जाने के बाद भी गाँव की स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है. प्रतिभा और मजदूर रोटी-रोजगार के लिए बदस्तूर पलायन कर रहे हैं. और बेहतर जीवन की ललक में ग्रामवासियों का बेहतर डेस्टिनेशन अब भी शहर ही है. इससे यह स्पष्ट जाहिर होता है कि हमारे गाँव को लेकर अबतक सरकारों की जो दृष्टि और नीतियाँ रही हैं वह गलत रही हैं.
महात्मा गाँधी ने गाँवों के विकास का जो स्वप्न देखा था, उसमें गाँव को आत्मनिर्भरता प्रदान करने की कल्पना थी. लोकतंत्र को राजधानियों तक सीमित रखने के बजाय गाँव तक पसारने की चाहत थी, मगर हमारे नीति-नियंताओं ने गाँवों के साथ-साथ गाँधी को भी ठगा. लोकतंत्र को जनता से जोड़ने के नाम पर ग्राम-पंचायतों का गठन तो किया गया, मगर ठीक वैसे ही जैसे बच्चों को बड़े नकली खिलौनों से बहला लेते हैं. सत्ता जनप्रतिनिधियों की अंजुरी से चलकर नौकरशाहों की जटा में समा गई. जनता ‘अमूल्य वोट’ का अधिकार पाकर धन्य हो गई. जनप्रतिनिधियों को राजधानियों का सुख प्राप्त हुआ तो नौकरशाहों को राजधानियों अथवा जिला मुख्यालयों का और जनता के नसीब में रहे गाँव. जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों को ही विकास की रूपरेखा तय करनी थी, इसलिए सरकारी धनों से पहला विकास राजधानियों का हुआ फिर जिला मुख्यालयों का. विकास के बजट से गाँव के विकास की बारी आई बिल्कुल आखिर में. यानी अब जब मामला बिल्कुल भयावह हो गया. वो भी तब जब नीति-नियंताओं को लगने लगा कि गाँव की आबादी को अगर गाँव में नहीं रोका गया तो हमारे शहर अस्त-व्यस्त हो जाएँगे.
कलतक गाँवों को विकास की पटरी से दूर रखा गया, वह साज़िश थी, मगर आज गाँवों के विकास के नाम पर जो धन लुटाया जा रहा है, वह नीति-नियंताओं की हवाई समझ है. खैरात बाँटने से न तो ग्रामवासियों का भला होना है, न ही हमारे गाँव का विकास होना है. ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए. मनरेगा और सब्सिडी से ग्रामवासियों को गाँव में नहीं रोका जा सकता. ग्रामवासी गाँव में रहना तब पसन्द करेंगे जब गाँव में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध होंगे. सिर्फ कम कीमत पर अनाज देने, इन्दिरा आवास बना देने और स्कूलों के नाम पर भवन खड़ा कर देने और प्राइमरी हेल्थ सेंटर बना देने भर से ग्रामवासी खुशहाल नहीं हो जाएँगे. वह खुशहाल तब होंगे, जब उनके जीवन के मूलभूत सपने गाँव में ही पूरे हो सकेंगे.           

 
हमारे गाँव के सर्जक धनंजय कुमार बिन्द प्रखण्ड के बीडीओ अशोक कुमार जी के साथ 

शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक पहल 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल.

Thursday, 28 November 2013

क्वालिटी एजुकेशन देने में कामयाब हो रहा है 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल'

'हमारे गाँव' विचार के तहत बिहार के नालन्दा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू किया देवनन्दन पब्लिक स्कूल निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. खुशी है कि स्कूल की तीनों टीचर्स अच्छा काम कर रही हैं. बच्चों की प्रोग्रेस किसी भी आगंतुक को लुभा ले रही है. शुद्ध हिन्दी भी नहीं बोल पाने वाले बच्चे अंग्रेजी सीख रहे हैं. पहली क्लास के बच्चे जो एडमिशन के वक़्त सही अल्फाबेट भी लिख - पढ़ नहीं पाते थे, अब इंग्लिश बुक की फ्लुएंट रीडिंग करने लगे हैं.
गाँव के बच्चों को आधुनिक भारत की धारा से जोड़ने के क्रम में मैंने 'हमारे गाँव' की संकल्पना में इंग्लिश मीडियम स्कूल की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था. इसी के तहत देवनन्दन पब्लिक स्कूल की 2012 में स्थापना की गई. स्कूल शुरू करते वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि टीचर ढूँढने में इतनी परेशानी आएगी. काफी मशक्कत के बाद भी मैं एक भी टीचर को अपने स्कूल से जोड़ नही पाया. कारण कोई भी टीचर शहर छोड़कर गाँव आने को तैयार नहीं हुआ. शहर से ज्यादा सेलरी देने को राज़ी होने के बाद भी.गाँव में जो टीचर मिल रहे थे, इंग्लिश में बिल्कुल साफ थे. अंदाज़ा लगाइए Fun  को वह 'फुन' प्रोनाउंस करते थे. लिहाजा सत्र 2012-13 में स्कूल शुरू नहीं हो पाया.
मैं समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ...मेरी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. तब मैंने निर्णय लिया कि गाँव की ही लड़कियों को टीचर बनाऊँगा. मैंने दो लड़कियों सिम्पी और आरती को लगभग चार महीने लगातार पढ़ाया और इस लायक बनाया कि नर्सरी से क्लास वन तक के बच्चों को ठीक से पढ़ा सके. और सुखद रहा कि दोनों ने पूरे मनोयोग से मेरे मिशन में मेरा साथ दिया. वे दोनों बिहारशरीफ के एक कॉलेज से बीए की पढ़ाई भी कर रही हैं. और शुरुआत में जहाँ वह बात करने में भी कमज़ोर थीं आज आत्मविश्वास से भरी हैं और मेरी अनुपस्थिति में भी ठीक से स्कूल चला ले रहीं हैं. इस बीच दो और लड़कियों पर मेहनत की-ममता और पूजा. ममता बीए में पढ़ती हैं. हालाँकि चार-पाँच महीने ही साथ रह पाई. अभी व्ह किसी और स्कूल में पढ़ा रही है. जबकि पूजा अभी ग्यारहवीं की छात्रा है. वह अब भी रेग्यूलर खासकर नर्सरी के बच्चों को पढ़ा रही है.
अगले साल सेकंड और थर्ड भी शुरू करने की तैयारी में हूँ. नई टीचर की तलाश शुरू कर दी है, पता नहीं इतिहास दोहराता है या इस बार बाहर से टीचर लाने में कामयाब हो पाता हूँ. मैं दोनों स्थिति के लिए तैयार हूँ.
बच्चों को घर से स्कूल लाने में गाड़ी की समस्या भी बड़ी संगीन रही. लोगों में प्रोफेशनलिज़्म और समय की कीमत की समझ बिल्कुल अल्प है. इस वजह से आठ -दस बच्चे स्कूल से हट भी गए. खैर डेढ़ सौ रुपए प्रति बच्चे का नुकसान सहकर किसी तरह काफी जद्दोजहद के बाद गाड़ी को समय पर चलवाने में कामयाब हो पाया हूँ. अगले सत्र में गाड़ी की सही व्यवस्था करने की कोशिश में अभी से जुटा हूँ.
बहरहाल खुशी है कि हर महीने कुछ हज़ार रुपए का नुकसान ही सही गाँवके बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे पाने की दिशा में सार्थक तरीके से बढ़ रहा हूँ.



Saturday, 30 March 2013

भीषण शोषण के शिकार हैं किसान


अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध हमारे जीवन का आधार हैं. हमारे शरीर के ज़रूरी पोषाहार इन्हीं चार अवयवों से मिलते हैं. इनके बिना हम स्वस्थ जीवन की कल्पना तक नहीं सकते. कुपोषण आज भी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है. अमेरिका जैसे देश में भी कुपोषण के शिकार लोग हैं. भारत में आधी से अधिक जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. इसमें बड़ी आबादी गाँवों में रहनेवाले लोगों की है. गाँव, जहाँ न्यूनतम खर्चे में लोग अपना गुजर-बसर कर लेते हैं, वहाँ भी लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता. पौष्टिक भोजन की तो बात ही कल्पना है. जबकि दुनिया का सारा अनाज, फल, सब्जियाँ और दूध गाँवों में ही उपजता है. कितनी विडम्बनापूर्ण है यह बात कि जहाँ अनाज उपजता है, वहीं के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता. जहाँ पौष्टिकता से भरपूर सब्जियाँ, फल और दूध  का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है, वहीं के लोग कुपोषण के शिकार हैं. क्या देश के प्रबुद्धों ने कभी इस पर विचार किया है? अगर विचार किया होता तो ज़रूरी पोषाहार उगाने वाले किसान आज़ादी के 65 साल बाद भी कुपोषण के शिकार न होते. अपने बेटों को किसानी के काम से दूर जाने के लिए प्रेरित न करते. उन्हें पढ़ा-लिखाकर मामूली चपरासी की नौकरी के लिए भी शहर भेजने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर न लगाते. जिस आँकड़ेबाजी पर दुनिया का बाज़ार टिका है, उस आँकड़े के गणित में भी खेत छोड़कर भाग रहे किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार किसानों को सहायता देने के नाम पर हर साल अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटती है, फिर भी किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं. किसानी भारी घाटे का सौदा बनी है. खेती करके किसानों और उनके मजदूरों का पेट भरना भी मुश्किल है. क्यों? जबकि उन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत और पसीने से उगाए अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध की प्रोसेसिंग से बनी खाद्य व पेय वस्तुओं से प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के व्यापारी लाखों-करोड़ों अर्जित कर रहे हैं. बासमती चावल उगानेवाले किसान अगले साल खेती करने के लिए कर्ज़ लेने को मजबूर हैं, जबकि बासमती चावल की खूबसूरत पैकेजिंग कर उपभोक्ताओं तक पहुंचानेवाले बिचौलिए खूबसूरत फिल्मी हीरोइनों के साथ महँगे होटलों में सपरिवार डिनर लेते हैं. आलू उत्पादक किसान अपनी मेहनत-पसीने से उगाए आलू को बाज़ार में बेचने से सड़कों पर गिराकर उस पर ट्रक चलवा देना अच्छा समझते हैं. जबकि चिप्स बनाने वाली कंपनियाँ सड़े हुए आलू फेंकने में भी अपना नुकसान पाती हैं. आखिर ऎसा क्यों होता है? क्या इस देश के बुद्धिजीवियों और बाज़ार विशेषज्ञों ने कभी इस पर सरसरी विचार भी किया है? अगर किया होता तो किसानों के हालात में सकारात्मक बदलाव आते.
इस देश के एक बड़े वर्ग को, जिनका खेती और किसानी से किसी भी स्तर पर सीधा सम्बन्ध नहीं है, उनको किसानों को मिलने वाली भारी (?) सरकारी सब्सिडी बेहद खलती है. हमें भी खलती है. मगर एक बुनियादी फर्क है- उन्हें लगता है किसान अकर्मण्य हैं, भारी सब्सिडी डकारने के बाद भी आत्महत्या कर हमारे महान देश को बदनाम कर देते हैं, जबकि हमें लगता है, भारी सब्सिडी की आड़ में वे हमारे भीषण शोषण को सफलतापूर्वक छुपा लेते हैं. सब्सिडी पाकर हम उनके अहसान तले दब जाते हैं और शोषण के खिलाफ विद्रोह तो क्या आह तक नहीं कर पाते. गैर किसान प्रबुद्धों सरकारी सब्सिडी (इसे शोषण का मुआवजा कहना सही होगा) हमें नहीं चाहिए. हम परजीवी नहीं हैं. मेहनत करना हमें आता है. चिलचिलाती धूप हो या कड़कड़ाती ठंढ या कि हहराती प्रलयंकर बरसात हम किसी से नहीं डरते, हम बिना एसी, बिना अलाव और बिना छाते-रेनकोट के मज़े से जीना जानते हैं. हम प्रकृति की विभीषिका के आदी हैं. आप हमारी तरफ उंगली उठाने या हमें बेचारा समझने से पहले अपने गिरेबाँ में झाँकिए...क्या आप हमारी परिस्थिति में कुछ दिन भी जी सकते हैं ? और रही सब्सिडी की बात, तो हमसे ज्यादा सब्सिडी आप भोगते हैं- गैस सिलिंडर से लेकर डीजल-पेट्रोल तक. परजीवी हम नहीं आप हैं. हमारे शोषण पर ही आपके कपड़ों की सफेदी है. इसीलिए शायद भारतीय जनमानस में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है-‘ कमाए लँगोटी खाये धोती ’.
किसानों को मत दीजिए सब्सिडी. सब्सिडी की किस तरह सरकार से लेकर उद्योगपति तक बँदरबाँट करते हैं, यह हम किसानों से बेहतर आप जानते हैं. हमें अपनी वस्तु का वास्तविक मूल्य दे दीजिए, बिना सब्सिडी आनंदपूर्वक जी लेंगे. किसी भी वस्तु का बाज़ार मूल्य उसकी लागत के आधार पर तय होता है. हमारी उपज का बाज़ार मूल्य भी वैसे ही आँकिए. फिर देखिए कौन कुपोषण का शिकार होता है !
इस देश के ज्यादातर किसान कम जोत वाले हैं- एक से दो एकड़ खेत वाले. हम दस एकड़वाले एक आम किसान का उदाहरण यहाँ लेते हैं. वह किसान अपने दस एकड़ खेत में धान और गेहूँ दोनों फसलों की अच्छी पैदावार करता है (प्रकृति अनुरूप रही तो, क्योंकि हम आज इक्कीसवीं सदी में भी प्रकृति पर आश्रित हैं) तो वह 12.8 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से धान या गेहूँ की उपज हासिल कर पाएगा. यानी दस एकड़ में 128 क्विंटल धान या गेहूँ वह उपजा पाएगा. सरकार के समर्थन मूल्य के आधार पर हिसाब लगाएँ तो 1350 रुपए प्रति क्विंटल की दर से उस किसान को गेहूँ के बदले कुल 1 लाख 72 हज़ार 8 सौ की राशि प्राप्त होती है, जबकि इतने ही धान के लिए किसान को 1250 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 1 लाख 60 हज़ार की राशि प्राप्त होती है. यानी एक साल की दोनों फसलों से उसे 3 लाख 32 हज़ार 8 सौ रुपए प्राप्त हुए. अब इसमें से उसके खर्चे को आधा कम कर दीजिए. यानी बचे 1 लाख 56 हज़ार 4 सौ रुपए. फिर उसमें उसकी और उसके परिवार की सालभर की मेहनत के मूल्य को घटाइए. बताइए कितना बचा उस किसान को...? क्या इस किसान से इस देश के किसी दफ्तर में काम करने वाले एक चपरासी की अर्निंग ज्यादा नहीं है ? क्या यह किसानों का अमानवीय शोषण नहीं है?
फुटपाथ पर बैठा छोटा से छोटा हॉकर और विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी सेवाएँ देनेवाला भी अपने सामान या सेवा का मूल्य स्वयं तय करता है, किंतु किसान अपनी उपज की कीमत तय नहीं पाता. क्या यह किसानों के साथ सभ्य समाज की ज्यादती नहीं है? भले समाज के भले सज्जनों हमें सब्सिडी मत दीजिए, हमें इनकम टैक्स में छूट भी मत दीजिए, हमें बस हमारे सामान की सही कीमत दे दीजिए. हम अपना और अपने परिवार का गुजारा चेहरे पर शिकन लाए बिना कर लेंगे. सज्जनों हम किसान भी चाहते हैं सरकारी सब्सिडी का खेल बंद हो, क्योंकि यह अनुदान नहीं, हमारी राष्ट्रीय धनराशि की लूट है.
धनंजय कुमार 

किसान 

धनंजय कुमार   
                   

Tuesday, 26 March 2013


"हमारे गाँव" के तहत गाँव के किसानों-मजदूरों और विकास की दौड़ में छूट गए ग्रामीणों के बीच शिक्षा का प्रकाश फैलाने और खेती को लाभ का कार्य बनाने की लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में किए जा रहे कार्यों की झलक.