अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध हमारे
जीवन का आधार हैं. हमारे शरीर के ज़रूरी पोषाहार इन्हीं चार अवयवों से मिलते हैं.
इनके बिना हम स्वस्थ जीवन की कल्पना तक नहीं सकते. कुपोषण आज भी दुनिया की सबसे
बड़ी समस्या है. अमेरिका जैसे देश में भी कुपोषण के शिकार लोग हैं. भारत में आधी से
अधिक जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. इसमें बड़ी आबादी गाँवों में रहनेवाले लोगों की
है. गाँव, जहाँ न्यूनतम खर्चे में लोग अपना गुजर-बसर कर लेते हैं, वहाँ भी लोगों
को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता. पौष्टिक भोजन की तो बात ही कल्पना है. जबकि दुनिया
का सारा अनाज, फल, सब्जियाँ और दूध गाँवों में ही उपजता है. कितनी विडम्बनापूर्ण
है यह बात कि जहाँ अनाज उपजता है, वहीं के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता. जहाँ
पौष्टिकता से भरपूर सब्जियाँ, फल और दूध
का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है, वहीं के लोग कुपोषण के शिकार हैं.
क्या देश के प्रबुद्धों ने कभी इस पर विचार किया है? अगर विचार किया होता तो ज़रूरी
पोषाहार उगाने वाले किसान आज़ादी के 65 साल बाद भी कुपोषण के शिकार न होते. अपने
बेटों को किसानी के काम से दूर जाने के लिए प्रेरित न करते. उन्हें पढ़ा-लिखाकर
मामूली चपरासी की नौकरी के लिए भी शहर भेजने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर न लगाते. जिस
आँकड़ेबाजी पर दुनिया का बाज़ार टिका है, उस आँकड़े के गणित में भी खेत छोड़कर भाग रहे
किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार किसानों को सहायता देने के नाम पर
हर साल अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटती है, फिर भी किसान खेत छोड़कर भाग रहे
हैं. किसानी भारी घाटे का सौदा बनी है. खेती करके किसानों और उनके मजदूरों का पेट
भरना भी मुश्किल है. क्यों? जबकि उन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत और पसीने से
उगाए अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध की प्रोसेसिंग से बनी खाद्य व पेय वस्तुओं से
प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के व्यापारी लाखों-करोड़ों अर्जित कर रहे हैं. बासमती चावल
उगानेवाले किसान अगले साल खेती करने के लिए कर्ज़ लेने को मजबूर हैं, जबकि बासमती
चावल की खूबसूरत पैकेजिंग कर उपभोक्ताओं तक पहुंचानेवाले बिचौलिए खूबसूरत फिल्मी
हीरोइनों के साथ महँगे होटलों में सपरिवार डिनर लेते हैं. आलू उत्पादक किसान अपनी
मेहनत-पसीने से उगाए आलू को बाज़ार में बेचने से सड़कों पर गिराकर उस पर ट्रक चलवा
देना अच्छा समझते हैं. जबकि चिप्स बनाने वाली कंपनियाँ सड़े हुए आलू फेंकने में भी अपना
नुकसान पाती हैं. आखिर ऎसा क्यों होता है? क्या इस देश के बुद्धिजीवियों और बाज़ार
विशेषज्ञों ने कभी इस पर सरसरी विचार भी किया है? अगर किया होता तो किसानों के
हालात में सकारात्मक बदलाव आते.
इस देश के एक बड़े वर्ग को, जिनका खेती और किसानी से किसी भी स्तर पर सीधा
सम्बन्ध नहीं है, उनको किसानों को मिलने वाली भारी (?) सरकारी सब्सिडी बेहद खलती
है. हमें भी खलती है. मगर एक बुनियादी फर्क है- उन्हें लगता है किसान अकर्मण्य
हैं, भारी सब्सिडी डकारने के बाद भी आत्महत्या कर हमारे महान देश को बदनाम कर देते
हैं, जबकि हमें लगता है, भारी सब्सिडी की आड़ में वे हमारे भीषण शोषण को
सफलतापूर्वक छुपा लेते हैं. सब्सिडी पाकर हम उनके अहसान तले दब जाते हैं और शोषण
के खिलाफ विद्रोह तो क्या आह तक नहीं कर पाते. गैर किसान प्रबुद्धों सरकारी
सब्सिडी (इसे शोषण का मुआवजा कहना सही होगा) हमें नहीं चाहिए. हम परजीवी नहीं हैं.
मेहनत करना हमें आता है. चिलचिलाती धूप हो या कड़कड़ाती ठंढ या कि हहराती प्रलयंकर
बरसात हम किसी से नहीं डरते, हम बिना एसी, बिना अलाव और बिना छाते-रेनकोट के मज़े
से जीना जानते हैं. हम प्रकृति की विभीषिका के आदी हैं. आप हमारी तरफ उंगली उठाने
या हमें बेचारा समझने से पहले अपने गिरेबाँ में झाँकिए...क्या आप हमारी परिस्थिति
में कुछ दिन भी जी सकते हैं ? और रही सब्सिडी की बात, तो हमसे ज्यादा सब्सिडी आप भोगते
हैं- गैस सिलिंडर से लेकर डीजल-पेट्रोल तक. परजीवी हम नहीं आप हैं. हमारे शोषण पर
ही आपके कपड़ों की सफेदी है. इसीलिए शायद भारतीय जनमानस में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध
है-‘ कमाए लँगोटी खाये धोती ’.
किसानों को मत दीजिए सब्सिडी. सब्सिडी की किस तरह सरकार से लेकर उद्योगपति तक
बँदरबाँट करते हैं, यह हम किसानों से बेहतर आप जानते हैं. हमें अपनी वस्तु का
वास्तविक मूल्य दे दीजिए, बिना सब्सिडी आनंदपूर्वक जी लेंगे. किसी भी वस्तु का
बाज़ार मूल्य उसकी लागत के आधार पर तय होता है. हमारी उपज का बाज़ार मूल्य भी वैसे
ही आँकिए. फिर देखिए कौन कुपोषण का शिकार होता है !
इस देश के ज्यादातर किसान कम जोत वाले हैं- एक से दो एकड़ खेत वाले. हम दस
एकड़वाले एक आम किसान का उदाहरण यहाँ लेते हैं. वह किसान अपने दस एकड़ खेत में धान
और गेहूँ दोनों फसलों की अच्छी पैदावार करता है (प्रकृति अनुरूप रही तो, क्योंकि
हम आज इक्कीसवीं सदी में भी प्रकृति पर आश्रित हैं) तो वह 12.8 क्विंटल प्रति एकड़
के हिसाब से धान या गेहूँ की उपज हासिल कर पाएगा. यानी दस एकड़ में 128 क्विंटल धान
या गेहूँ वह उपजा पाएगा. सरकार के समर्थन मूल्य के आधार पर हिसाब लगाएँ तो 1350
रुपए प्रति क्विंटल की दर से उस किसान को गेहूँ के बदले कुल 1 लाख 72 हज़ार 8 सौ की
राशि प्राप्त होती है, जबकि इतने ही धान के लिए किसान को 1250 रुपए प्रति क्विंटल
के हिसाब से 1 लाख 60 हज़ार की राशि प्राप्त होती है. यानी एक साल की दोनों फसलों
से उसे 3 लाख 32 हज़ार 8 सौ रुपए प्राप्त हुए. अब इसमें से उसके खर्चे को आधा कम कर
दीजिए. यानी बचे 1 लाख 56 हज़ार 4 सौ रुपए. फिर उसमें उसकी और उसके परिवार की सालभर
की मेहनत के मूल्य को घटाइए. बताइए कितना बचा उस किसान को...? क्या इस किसान से इस
देश के किसी दफ्तर में काम करने वाले एक चपरासी की अर्निंग ज्यादा नहीं है ? क्या
यह किसानों का अमानवीय शोषण नहीं है?
फुटपाथ पर बैठा छोटा से
छोटा हॉकर और विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी सेवाएँ देनेवाला भी अपने सामान या सेवा
का मूल्य स्वयं तय करता है, किंतु किसान अपनी उपज की कीमत तय नहीं पाता. क्या यह
किसानों के साथ सभ्य समाज की ज्यादती नहीं है? भले समाज के भले सज्जनों हमें
सब्सिडी मत दीजिए, हमें इनकम टैक्स में छूट भी मत दीजिए, हमें बस हमारे सामान की
सही कीमत दे दीजिए. हम अपना और अपने परिवार का गुजारा चेहरे पर शिकन लाए बिना कर
लेंगे. सज्जनों हम किसान भी चाहते हैं सरकारी सब्सिडी का खेल बंद हो, क्योंकि यह
अनुदान नहीं, हमारी राष्ट्रीय धनराशि की लूट है.
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| धनंजय कुमार |
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| किसान |
धनंजय कुमार


धनंजय जी -भारत में जितनी विषमताए है उनके पीछे दृढ इच्छा शक्ति का आभाव है.अभी सामंतवादी मानसिकता से हम स्वयम को उबार नहीं पाए है.यही परिलक्षित होता है हमारी शासन प्रणाली में.शासन प्रणाली में सामंतवादी मानसिकता की ही अभिव्यक्ति है आज भी हम भारत के लोग जिसमे गरीबी रेखा से निचे जीवन यापन करने वाले लोग भी गण है उपेक्षित है.सांगठनिक अभाव में उनका प्रतिनिधित्व करने वाला आज कोई नहीं .............सादर
ReplyDeleteभाई रवि जी आप बिल्कुल सही परिप्रेक्ष्य में विषय को देख रहे हैं. आभार प्रतिक्रिया देने के लिए.
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