Friday, 9 September 2011

हमारे गाँव



Add caption
गाँव !
प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!
जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.
भारत गाँवों का देश है,मगर संभ्रांत वर्ग की दृष्टि में हमारे गाँव देश के लिए बोझ बने हैं. वहां रहने वाले लोग income tax नहीं भरते,मगर vote के चक्कर में सरकार income tax भरने वालों का पैसा शहरों में लगाने के बजाय गाँवों पर खर्च कर रही है.और गाँव के लोग हैं कि मामूली रोज़ी-रोज़गार के लिए भी शहर भागे आ रहे हैं.शहरों में भीड़ बढती जा रही है.
गाँव के लोग भी गावों में नहीं रहना चाहते.वह खेती नहीं करना चाहते,क्योंकि उनके लिए खेती साल दर साल घाटे का कारोबार बनती जा रही है.वह खेत बेचकर भी अपने बाल-बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते हैं,ताकि बच्चे अच्छी नौकरी पा सकें और गाँव से पाला छूटे.स्वाभाविक सा प्रश्न है,ऐसा क्यों?
तो उत्तर भी उतना ही सहज है कि गाँव को हमने लगातार कम करके आँका. विकास की धुरी हमने शहर को बनाया और गाँव की लगातार हम उपेक्षा करते रहे.हमारी किताबों में हमें पढाया जाता तो रहा कि भारत गाँवों का देश है,मगर आज़ादी के बाद भी हमारे गाँव विकास की धुरी नहीं बन सके. मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि भारत को भले ही 1947 में आज़ादी मिल गयी, लेकिन हमारे गाँव आज भी गुलाम हैं.स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज भारतवर्ष से सस्ती कीमत पर कच्चा माल बाहर ले जाते थे और फिर उससे ही सामान बनाकर महँगी कीमत पर भारतवासियों को बेचते थे.वही स्थिति आज गाँवों की है; व्यापारी आलू से लेकर लीची तक गाँव से औने पौने दाम में ले जाते हैं और फिर चिप्स,शराब,जूस आदि के रूप में मंहगी कीमत पर हमें बेचते हैं.यह हमारे आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए दशकों पहले सोचने का विषय यह होना चाहिए था कि हमारे किसान,जो देश को खिला-पिला कर तंदुरुस्त रखते हैं, वो अपने खेतों में हल नहीं चला पा रहे हैं और शराब जैसी अज़रुरी चीज़ बनाने वाले लोग हवाई जहाज चला रहे हैं.
सुन रहे हैं लोग...  
धनंजय कुमार   

1 comment:

  1. बहुत ही सुन्दर लेख एस लेख दिल को छु जाते हे

    ReplyDelete