Tuesday, 24 December 2013

स्त्री स्वर

मैं सामान नहीं हूँ, मैं जागीर नहीं हूँ
मुझसे यूँ न खेलो, मैं बस देह नहीं हूँ.

गुड्डी-गुड़िया नहीं पुकारो, कुल का दीपक हूँ मैं,
मैं भी नभ को छू सकती हूँ, जग की रौनक हूँ मैं.

कबतक ज़ुल्म करोगे, कब साथी समझोगे?
कभी हृदय से पूछो क्या मेरे बिन जी लोगे ?

छाया बनकर रही प्रेमवश,तुमने अक्षम माना
मुझको हर रिश्ते में लेकिन तुमने गलत ही जाना

देवी मुझको मत बोलो, बस इंसा ही रहने दो
मेरे हिस्से का सुख दे दो, मुझको भी जीने दो

मुझको कम ना आँको, ज़रा न तुमसे कम हूँ
मैं ममता,साहस, कौशल्य तीनों का संगम हूँ

धनंजय कुमार

1 comment:

  1. बहुत खूब ..............." जगत जननी है नारी" ...........

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